Wednesday, 17 June 2020

// // Leave a Comment

कहीं हम ए इतिहास भूल न जाएँ


कहीं हम ए इतिहास भूल न जाएँ
👉 वर्तमान हिन्दू धर्म, वैदिक ब्राह्मणों ने बौद्ध धर्म से चुराया और अपना लेबल चिपकाकर मार्किट में उतारा है.....
1)   गुरु पूर्णिमा-
गौतम बुद्ध ने आषाढ़ पूर्णिमा के दिन सारनाथ में प्रथम बार पांच परिज्रावको को दीक्षा दी थी। ये दिन बौद्धों के जीवन में गुरु पूर्णिमा के नाम से जाना जाता था।
बौद्ध धम्म  समाप्त करने के बाद ब्राह्मण धर्म के ठेकेदारो ने इस पर कब्ज़ा किया।
2) कुम्भ का मेला-
कुम्भ का मेला बौद्ध सम्राट हर्षवर्धन ने शुरू करवाया था जिसका उद्देश्य बुद्ध की विचारधारा को फैलाना था। इस मेले में दूर दूर से बौद्ध भिक्षु, श्रमण, राजा, प्रजा, सैनिक भाग लेते थे।
बौद्ध धर्म समाप्त करने के पश्चात ब्राह्मणों ने इसको अपने धर्म में लेकर अन्धविश्वास घुसा दिया।
3) चार धाम यात्रा-
बौद्ध धम्म में चार धामों का विशेष महत्त्व था। ब्राह्मणों ने बौद्ध धम्म के चार धामो को अपने काल्पनिक देवी-देवताओ के मंदिरो में बदल दिया और अपने धर्म से जोड़ दिया।
4) जातक कथाएँ-
जातक कथाये बौद्ध धम्म में विशेष महत्त्व रखती है। इन कथाओ द्वारा बौद्धिस्ट की दस  परमिताओं को समझाया जाता था। कुछ कथाये गौतम बुद्ध काल की और कुछ बाद की लिखी गयी है।
बौद्ध धम्म समाप्त करने के पश्चात ब्राह्मणों ने इन कथाओ का ब्रह्मणिकरण  करके अपने धर्म में लिया और इन कथाओ में कुछ काल्पनिक कथाये, कुछ ऐतिहासिक बौद्ध स्थलो को जोड़कर रामायण और महाभारत की रचना की गयी।

5) विजयादशमी-
सम्राट अशोक ने कलिंग विजय के पश्चात अश्विन दशमी के दिन बौद्ध धम्म स्वीकार किया था। ये दिन विजयदशमी के रूप में जाना जाता था। इसी दिन ब्राह्मण पुष्यमित्र शुंग ने मौर्य सम्राट बृहदर्थ मौर्य की हत्या की थी। मौर्य सम्राट दस परमिताओं का रक्षक था। दस परमिताओं का रक्षक हार गया-दशहरा बौद्ध धम्म समाप्त करने के पश्चात ब्राह्मणों ने इस दिन को काल्पनिक कथा रामायण  के राम-रावण से जोड़कर दशहरा बना दिया। तुलसीदास की रामचरितमानस के अनुसार रावण चैत्र के महीने में मारा गया था।
6) दीपदानोत्सव –
a) गौतम बुद्ध को ज्ञान प्राप्त होने के पश्चात जब गौतम बुद्ध कपिलवस्तु आये थे तो उनके पिता ने उनके आने की ख़ुशी में नगर को दीपो से सजाया था।

7)
सम्राट अशोक ने 84000 बौद्ध स्तूप/चैत्य/विहार बनवाये थे। इन स्तूप /चैत्य/विहारों का उदघाटन कार्तिक अमावस्य के दिन दीप जलाकर किया था और ये दिन दीपदानोत्सव के नाम से जाना जाता था। क्योंकि ये चैत्य/विहार/स्तूप  भारतवर्ष में ही थे इसलिए ये त्यौहार केवल भारत तक ही सिमित था।
बौद्ध धर्म समाप्त करने के पश्चात ब्राह्मणों ने इस त्यौहार को काल्पनिक कथा रामायण के पात्र राम से जोड़ दिया।
8) लिंग-योनि की पूजा पुष्यमित्र शुंग की प्रतिक्रांति के बाद प्रथम शताब्दी में शुरू हुई-
ब्राह्मणों ने बौद्धों से कहा कि ईश्वर है जिसने ये संसार बनाया है और तुम्हे भी बनाया है। बौद्धों ने ब्राह्मणों से कहा कि ईश्वर कल्पनामात्र है। ये दुनिया लिंग-योनि की क्रिया के कारण पैदा हुई है और प्राकृतिक है।
ब्राह्मणों ने प्रतिक्रिया स्वरूप बौद्धों से ताकत के बल पर लिंग-योनि की मूर्ती पूजवाई। बाद में इसको मनगढ़ंत कहानी द्वारा पुराणों में शिव से जोड़ दिया और अंधविश्वासी लोग लिंग-योनि को शिव-लिंग मानकर पूज रहे है।
9) ब्राह्मणों के व्यावसायिक केंद्र-
आज जहाँ-जहाँ पर ब्राह्मणों के काल्पनिक देवी-देवताओ के बड़े-बड़े मंदिर है वहाँ कभी बौद्ध धर्म के केंद्र होते थे,जैसे-अयोध्या, काशी, थुरा,पूरी,द्वारका,रामेश्वरम,केदारनाथ,बद्रीनाथ,तिरुपति, पंढरपुर ,शबरिमला आदि।
बौद्ध धर्म समाप्त करने के पश्चात ब्राह्मणों ने उन्हें मंदिरो में बदल दिया।
आप जाकर देखिये वर्तमान में तिरुपति बालाजी के मंदिर में मूर्ति स्वयं गौतम बुद्ध की है।इस बौद्ध मंदिर पर ब्राह्मणों ने कब्ज़ा करके बुद्ध को आभूषण और कपडे पहना दिए और उसका नाम अलग-अलग रख दिया। कोई इसको बालाजी,कोई वेंकटेश्वर, कोई शिव,कोई हरिहर,कोई कृष्ण,कोई शक्ति बोलता है।
10) पीपल की पूजा-
भारत के मूलनिवासी प्रकृति पूजक थे। पीपल के पेड़ के नीचे गौतम बुद्ध को ज्ञान प्राप्त हुआ था इसलिए पीपल की पूजा का महत्त्व और भी बढ़ गया था। ब्राह्मणों ने बौद्ध धर्म समाप्त करने के पश्चात पीपल के पेड़ के नीचे एक पत्थर गाड़ दिया और इसे पिपलेश्वर महादेव बना दिया।
11)वट वृक्ष की पूजा-
गौतम बुद्ध ने पहला उपदेश सारनाथ में वट वृक्ष के नीचे दिया था इसलिए लोग वट वृक्ष को भी पूजने लगे थे।
बौद्ध धर्म समाप्त करने के पश्चात ब्राह्मणों ने इसे अपने धर्म में लेकर सत्यवान- सावित्री की काल्पनिक कथा से जोड़ दिया।
12) सिर का मुंडन-
बौद्ध भिक्षु अपने सिर के बाल मुंडवाकर रखते थे। बौद्ध धर्म समाप्त करने के पश्चात ब्राह्मणों ने बौद्ध धर्म के प्रति नफरत फैलाने के लिए मृत्यु के पश्चात परिवार के लोगो का सिर मुड़वाने की प्रथा की शुरुवात की ।।
👉ये लेख ब्राह्मणवाद की विकृति दर्शाता है...। (Taken from what's app)


Read More

Monday, 27 April 2020

// // Leave a Comment

অজ্ঞানতাই সব বিসমতার মূল - গৌতম বুদ্ধ



অজ্ঞানতাই সব বিসমতার মূল - বুদ্ধ  

     সারিপুত্ত আর মুগলানার গুরু সঞ্জয় নিজেকে মহান জ্ঞানী ব্যক্তি বলে মনে করেন। তাঁর জ্ঞানের প্রকাশ করার জন্য একবার বুদ্ধের কাছে এসে তর্ক যুদ্ধ শুরু করতে চান।
বুদ্ধ তাঁকে দেখেই বলেন- সারিপুত্ত আর মুগলানার গুরু সঞ্জয় এসেছেন?

 তিনি বুদ্ধকে বলেন, যেদিন থেকে “আমার শিষ্য আপনার ভিক্ষু হয়েছে, সেই দিন থেকে আমার মন উৎসুক হয়েছে আপনার সঙ্গে দেখা করার জন্য। আমারও কিছু প্রশ্ন আছে। কৃপা করে তার উত্তর দেবেন কি?
বুদ্ধ – অবশ্যই।
সঞ্জয় – আপনার শিক্ষা কী? আপনার সিদ্ধান্ত (principal) কী?
আমি আমার সম্পর্কে বলছি, আমি কোনো সিদ্ধান্তের উপর ভরসা করিনা।
বুদ্ধ- আপনি কোনো সিদ্ধান্তের উপর ভরসা করেন না, এই কথার উপর ভরসা আছে কি? আপনি অবিশ্বাসী হওয়ার কথায় বিশ্বাস করেন কি?
সঞ্জয়- এটাতো তর্কের খেলা।
বুদ্ধ – না। এটা আপনার বুদ্ধির খেলা।
সঞ্জয় – আমার বিশ্বাস আর অবিশ্বাসের তো প্রশ্নই নেই। প্রশ্ন হচ্ছে আপনার সিদ্ধান্ত কী?
বুদ্ধ-  যদি কোন ব্যক্তি একবার কোন সিদ্ধান্তকে স্বতসিদ্ধ হিসাবে আকড়ে থাকে, তাহলে সে সর্ব প্রথম নিজের স্বতন্ত্রতাকে নষ্ট করে দেয়। সে অন্ধবিশ্বাসী হ’তে শুরু করে। তার তখন মনে হয়, সে  যে সিদ্ধান্তকে আকড়ে আছে সেটাই সঠিক। সে যেটা বিশ্বাস করে, সেটাই সত্য। বাকী সব অসত্য। আর সেখানে বিচারের স্বতন্ত্রতার (thoughts of freedom) বলি হয়। সেখানে একই বিচার ঘিরে ধরে থাকে। মানুষ  আরো সংকীর্ণ হতে শুরু করে। এর থেকে সংঘর্ষ ও দ্বন্দ্ব শুরু হয়। কোন কথার উপর বিশ্বাস বা  অবিশ্বাসের প্রতি বিশ্বাস ধোঁয়াসা সৃষ্টি করে। বিচারের ভীষণ শক্তি আছে। বিচারের শক্তি মূল পর্যন্ত  প্রসারিত থাকে। এই বিচারের আসক্তি থেকে মুক্ত হওয়া আত্মবিশ্বাসের সব থেকে বড়ো বাধা। যদি সে ঐ বিচারের মধ্যেই আবদ্ধ থাকে, তাহলে পরম জ্ঞানের দ্বার কোনদিন খুলবে না।

সঞ্জয় – যদি আপনার শিক্ষা কেউ পালন করে তাহলে কি সেও বন্ধনে বাঁধা পড়ে?
বুদ্ধআমি অনুভবের (experience) কথা বলি। আমার মার্গ, কোনো সিদ্ধান্ত নয়। কোনো দর্শন শাস্ত্রও নয়। কেবলমাত্র শুদ্ধ অনুভব এটা। পরম সত্যের অনুভব।
সঞ্জয় – কিন্তু বুদ্ধ, যদি কেউ আপনার মার্গকেই তার সিদ্ধান্ত মনে করে তাহলে?

বুদ্ধ- আমার মার্গ (path) অভ্যাসের উপর দাঁড়িয়ে আছে। এটাকে কোনো স্থুল পদার্থের মতো ধরা যায় না বা তাকে পুজনীয় বানানো যায়না। আমার জ্ঞানকে এরকম ভাবা যায়, একটা নৌকার মতো। নৌকার সাহায্যে নদী পার হওয়া যেতে পারে। কিন্তু নদী পার হওয়ার পর আমরাতো নৌকাকে মাথায় নিয়ে যাই না। তাই না?

সঞ্জয় –মনে হচ্ছে আপনার চরণে লুটিয়ে পড়ি। কিন্তু এখনো এরকম কিছু ভাবনা আছে যার আসর এখনো পর্যন্ত আমার মনের মধ্যে রয়েগেছে।

বুদ্ধতিন প্রকারের ভাবনা হয়। সুখ, দুঃখ ও প্রাকৃতিক। এই তিন ভাবনার মূল আমাদের শরীর আর মনের মধ্যেই স্থির আছে। ভাবনা ঢেউ এর মতো ওঠে। আবার নিজেই বিলিন হয়ে যায়। আমি বলি প্রথমে এই ভাবনার ঢেউ ওঠার গভীরতা দেখ, বোঝ, জানো। এই ঢেউ কোথা থেকে উতপন্ন হচ্ছে। সুখের ভাবনা বা দুঃখের ভাবনাই হোক না কেন, শুধুমাত্র দেখো এটা কোথা থেকে  উৎপন্ন হচ্ছে। তার উৎস কী? যখন তার মূলে পৌঁছাবে সেখানে দেখতে পাবে শুধুমাত্র শূন্য।  শূন্য স্থানটা এমন, যেন একটা নীল আকাশ। জায়গাটা শূন্য। কিন্ত সবকিছু তারমধ্যে মিলিত হয়ে আছে।

সঞ্জয়- একটা চাদরের মতো।

বুদ্ধ -শুধু অভ্যাস করো। ধীরে ধীরে অভ্যাস করতে করতে এটা পাবে যে, ঢেউ ওঠা বন্ধ হয়েগেছে। পরম শান্তির ঝীল (lake) আমাদের অন্তরে আছে সেটা বিচলিত হচ্ছে না। তারপর আরো গভীরে গেলেন বুঝতে পারবে ভুল কোথায় হচ্ছিল। যেটা নশ্বর (mortal) তাকে অবিনশ্বর  ভেবে বসে আছো। অজ্ঞানই সকল বিসমতার মূল। আমি শুধুমাত্র জ্ঞান (wisdom) এর কথা বলছি। জ্ঞান থেকেই অজ্ঞানতা দূর হবে। অজ্ঞানতা পুজা-পার্বণ করে দূর করা যায় না। ব্রত পালন করে দূর করা যায় না। না কি দান করে দূর করা যাবে। বা কোনো মেডিটেশন করে সমাপ্ত হবে। অনেক সময় পর্যন্ত নিদ্রায় আছো সঞ্জয়। ওঠো, জাগো। নিজেকে জানো।  (আত্মদীপভব)।

সঞ্জয় – আপনি দর্পন (আয়না)। আপনার প্রতি দৃষ্টি দিয়ে দেখার পর আজ আমি আমার সত্যের প্রতিবিম্ব দেখেছি। আর আমি অজ্ঞানতার জীবন ব্যতীত করবো না। আমাকে আপনার ভিক্ষু স্বীকার  করুন। আমি বুদ্ধের শরণে যাচ্ছি। ‘ধম্ম’ যেটা আপনার স্বরূপ আমি তার শরণে যাচ্চি। আমি  সঙ্ঘের শরণে যাচ্ছি। বুদ্ধং শরণং গচ্ছামি। ধম্মং শরণং গচ্ছামি। সঙ্ঘং শরণং গচ্ছামি।         
Read More

Sunday, 8 March 2020

// // Leave a Comment

Women's Day -নারী দিবসে কিছু কথা লেখক- জগদীশচন্দ্র রায়

নারী দিবসে কিছু কথা
লেখক- জগদীশচন্দ্র রায়
     প্রবাদ আছে অধিকার কেউ কাউকে দেয়না, অধিকার ছিনিয়ে নিতে হয়। ৮ মার্চ নারী দিবস। নারীদের অধিকার প্রতিষ্ঠার দিবস।
    প্রাচীনকাল থেকে বর্তমানকাল পর্যন্ত ভারতীয় উপমহাদেশে নারীকে মানবিক অধিকার থেকে  বঞ্চিত করা হয়েছে। তাকে শুধু সন্তান উৎপাদনের যন্ত্র ও ঘরের কাজের লোক হিসাবেই ধরে নেওয়া হয়েছে। ব্রাহ্মণ্যবাদী শাস্ত্রে নারীকে শুদ্রের স্থান দেওয়া হয়েছে অর্থাৎ ‘নীচ্‌’ হিসাবে গণ্য   করা হয়েছে। প্রশ্ন হচ্ছে কেন? প্রাচীনকালের কোনো একসময়ে মাতৃ প্রধান সমাজ ব্যবস্থা ছিল। কিন্তু সামাজিক প্রগতির সঙ্গে সঙ্গে সেটা হয়েগেল পুরুষ তান্ত্রিক সমাজ ব্যবস্থা।  
    প্রশ্ন হচ্ছে, আজকের দিনে তো নারীর অনেক প্রগতি হয়েছে। সেটা কিভাবে? সময়ের সঙ্গে সঙ্গে? না কি এর জন্য কঠোর সংগ্রাম করতে হয়েছে এই অধিকার পাওয়ার জন্য?
আমি প্রথমেই উল্লেখ করেছি, অধিকার কেউ কাউকে দেয়না, অধিকার ছিনিয়ে নিতে হয়।
তাহলে আসুন সে সম্পর্কে কিছুটা জেনে নেওয়া যাক- তার পূর্বে জানিয়ে দেই যে, কোনো সমাজ  ব্যবস্থা বা গোষ্ঠীর পরিবর্তন বা প্রগতির মূল হচ্ছে শিক্ষা। কারণ, শিক্ষা হচ্ছে সেই মশাল যেটা অনেক বাধাকে অতিক্রম করে সঠিক দিশা নির্দেশ করে। সন্তানের প্রথম শিক্ষিকা হচ্ছে-  ‘মা’। আবার শিক্ষা হচ্ছে মায়ের মতো। অর্থাৎ ‘মা’ হচ্ছে ‘শিক্ষা’, আর ‘শিক্ষা’ হচ্ছে ‘মা’। কিন্তু এই  ‘মা’কেই  ব্রাহ্মণ্যবাদী ব্যবস্থা অশিক্ষিত করে দূরে সরে রেখেছে। তাই সন্তান জন্ম নিয়েছে মানসিক পঙ্গু হয়ে। সেই সন্তানের মানসিক পঙ্গুত্ব থেকে মানসিক বিকাশের জন্য মহারাষ্ট্রে মহান সমাজ সংস্কারক-
 জ্যোতিরাও ফুলে ঘোষণ করলেন-    
  বিদ্যা বিনা মতি (বুদ্ধি) গেছে
মতি বিনা নিতি (আদর্শ) গেছে
এতো সব অনর্থ একমাত্র অবিদ্যার জন্য হয়েছে।  
সাবিত্রিবাই ফুলে-
 তিনি নিজের জীবন সঙ্গীনী সাবিত্রীবাই ফুলেকে শিক্ষিত করে তুললেন, আর তাঁকে গড়ে তুললেন নারী শিক্ষার প্রথম স্তম্ভ হিসাবে। ভারতের অনাবাদী জঙ্গলময় অশিক্ষার ভূমিতে প্রথমে স্ত্রী শিক্ষার চারা গাছ রোপন করেন। আর ধীরে ধীরে সেই শিক্ষার চারা গাছ বিশাল বটবৃক্ষের মত বিস্তারলাভ করে। অর্থাৎ প্রথম শিক্ষিকা হলেন- মাতা সাবিত্রীবাসি ফুলে। এই কাজে সহায়তা করলেন আর  একজন মহিয়সী- ফতিমা সেখ।  
  ভারতবর্ষে হাজার বছর ধরে শোষিত বঞ্চিত, আদিবাসী ও অতি পিছিয়ে পড়া শ্রেণিকে শিক্ষার আলো থেকে বহু যোজন দূরে সরিয়ে রেখেছিল ব্রাহ্মণ্যবাদী ব্যবস্থা। সেই শিক্ষার আলোকে তিনি এই বঞ্চিতদের ঘরে ঘরে পৌঁছে দেওয়ার জন্য প্রতিজ্ঞাবদ্ধ হন। শিক্ষা গ্রহণের অধিকারকে হাজার বছর ধরে ষড়যন্ত্র করে বন্ধ করে রাখার ফলে জঞ্জালের পাহাড় জমে ছিল, সেই জঞ্জালকে এক ঝকটায় সরিয়ে দিয়ে তিনি শিক্ষার বীজ বপন করতে শুরু করেন।
হাজার বছর ধরে শিক্ষা থেকে বঞ্চিত করে রাখা সর্ব শ্রেণীর স্ত্রীদের জন্য তিনি যখন এক ঝটকায় শিক্ষার দরজাকে লাথি মেরে উন্মুক্ত করে দেন; তখন শিক্ষার বন্ধ দরজা খোলার আওয়াজ শুনে পুনের ব্রাহ্মণ্যবাদীদের কান ফেটে যায়। তাদের কাছে বজ্রাঘাতের মত এই ঘটনা মনে হয়। তখন তারা অমানবিক সামন্ততাত্রিক প্রথার ঘুমন্ত সিংহ কে জাগিয়ে তোলে। তারা মাতা সাবিত্রী ফুলে ও মহাত্মা জ্যোতিরাও ফুলের উপর বিভিন্নভাবে প্রাণ নাশের চেষ্টা চালায়। কিন্তু শত প্রতিকূলতার মধ্যেও তাঁরা তাদের আন্দোলনকে থেমে যেতে দেননি।
বেগম রোকেয়া-
বেগম রোকেয়া রক্ষণশীল সমাজ ব্যবস্থায় জন্মগ্রহণ করেও তিনি নারীর মর্যাদার জন্য সংগ্রাম করেছেন। তিনি বলেছেন-আমাদের অন্ধকারের রাখার জন্য পুরুষেরা ধর্মগ্রন্থগুলোকে ঈশ্বরের আদেশপত্র বলে প্রচার করেছে। এই ধর্ম গ্রন্থগুলো পুরুষদের দ্বারা রচিত বিধি ব্যবস্থা ছাড়া আর কিছুই নয়।
হরিচাঁদ ঠাকুরঃ-
     এই একই কথার সুর ধরে আমরা যদি বাংলার দিকে তাকাই সেখানে দেখতে পাই- পতিত পাবন হরিচাঁদ ঠাকুরের ভাষায় –
নারী পুরুষ পাবে সম অধিকার।।
সমাজে পুরুষ পাবে যেই অধিকার  
গুরুচাঁদ ঠাকুরঃ-
 হরিচাঁদ ঠাকুরের সুযোগ্য পুত্র পিতার মতো শ্লোগান তুললেন-               
“খাও বা না খাও তা’তে কোন দুঃখ নাই।
ছেলে পিলে শিক্ষা দেও এই আমি চাই”।।  -গুরুচাঁদ চরিত- পৃঃ ১৪৪
অর্থাৎ ‘খেতে না পাওয়ার অভাব থেকে অশিক্ষার অভাব আরো অনেক বড়। তাই খাদ্য কষ্টের যন্ত্রনা সহ্য করতে পারলেও শিক্ষা স্বরূপ খাদ্য থেকে যদি কেউ বঞ্চিত থাকে তাহলে সে যন্ত্রনা কারো একার নয়, সেটা দেশ ও সমাজের ক্ষেত্রেও প্রগতির অন্তরায় স্বরূপ। তাই যেকোনো পরিস্থিতিতে সন্তানকে শিক্ষিত করতে হবে। প্রয়োজনে ভিক্ষা করেও এই অশিক্ষার অন্ধকারকে দূর করতে হবে
 তিনি অবিদ্যাকে মারণ ব্যাধির সঙ্গে তুলনা করেছেন। তাই তিনি বলেছেন-
                           অজ্ঞান ব্যাধিতে ভরা আছে এই দেশ।
                            জ্ঞানের আলোকে ব্যাধি তুমি কর শেষ।। গুরুচাঁদ চরিত পৃ.১৩৭
                            মাতা ভাল নাহি হ’লে পুত্রভাল নয়।
                            “মা’র গুণে ছা’ ভাল” লোকে তাই কয়।। গু.চ. ৩৬২
তিনি নারীদের শিক্ষার জন্য ‘শান্তি –সত্যভামা’ নামে স্কুল গড়ে তোলেন। সেখানে শুধু নারীর শিক্ষা নয়, নারীর সমাজ অধীকারের কথাও দৃপ্ত কন্ঠে ঘোষণা করেন।
                            বালক বালিকা দোঁহে পাঠশালে দাও।
                            লোকে বলে “মা’র গুণে ভালো হয় ছাও।।”
তৎকালীন বর্ণবাদী সমাজ ব্যবস্থার রক্ত চক্ষুকে উপেক্ষা করে তিনি ১৯১০ সালে বিধবা বিবাহ শুরু করেন। আর বাল্য বিবাহ বন্ধের নির্দেশ দেন। নারীকে সমান অধিকার দেওয়ার সঙ্গে তিনি নারী তথা সকল মানুষকে এক জাতি অর্থাৎ মানব জাতি বলে গণ্য করেছেন।

ড. বাবাসাহেব আম্বেদকরঃ-
 নারীর প্রগতির জন্য সর্বদা সংগ্রাম করেছেন।
নারী ও শ্রমিকদের সুবিধাঃ- বাবা সাহবে হিন্দুকোড বিল বানিয়েছিলেন নারীদের সমমর্যাদার অধিকার দেওয়ার জন্য। পিতার সম্পত্তিতে কন্যার সমান অধিকার, বিবাহিত পুরুষ এক স্ত্রী বর্তমান থাকতে অন্য স্ত্রীকে গ্রহণ করতে পারবেনা। যদিও তখনকার সরকার সেটার মান্যতা দেয়নি। পরবর্তীতে সেটা চালু করা হয়। মহিলাদের মাতৃত্বকালী ছুটি, এবং প্রতিদিন আট ঘন্টা কাজের সময় নির্ধারণ বাবা সাহেবের অবদান। তিনি যখন শ্রমসচিব (মন্ত্রী) তখন (১)কয়লা শ্রমিকদের নানা ধরনের সহায়তা প্রদান, (২) মহিলা শ্রমিকদের প্রসবকালীন ৩২৯দিন ছুটি, (৩) কর্ম বিনিয়োগ কেন্দ্র, (৪) ৮ ঘণ্টা কাজের আইনী স্বীকৃতি, (৫) ট্রেড ইউনিয়ন অধিকার সম্প্রসারণ, (৬) ন্যূনতম বেতন সহ নানা শ্রমিক  কল্যাণ আইন পাস ও কার্যকর করেন।
     এছাড়াও আরো অনেক মণীষী নারীর অধীকারের জন্য সংগ্রাম করেছেন। যেমন রাজা রাম মোহন রায়- নিজের বৌদির সতি হওয়া দেখে বিচলিত হয়ে যান। তারপর তিনি ইংরেজদের সহায়তায় সতীদাহ প্রথাকে আইন করে বন্ধ করতে সমর্থ হন।
   ঈশ্বরচন্দ্র শর্মা (বিদ্যাসাগর)- তিনিও নারীর মর্যাদা নিয়ে সংগ্রাম করেন।
    এই মহান সংগ্রামীরা নারীর অধিকার প্রতিষ্ঠার জন্য যেভাবে সংগ্রাম করেছেন, সেটা জাতি-ধর্ম-বর্ণ নির্বিশিষে সকলের জন্য। কিন্তু সমাজে সেটা খুবই কম উল্লেখ করা হয়। অনেকে তো বাবা সাহেবের নাম শুনলেও কেমন জাতিগত গন্ধ পায়। আর হরিচাঁদ ঠাকুর ও গুরুচাঁদ ঠাকুরের এতোবড় অবদানের কথা হয়তো অনেকেই ইতিপূর্বে শোনেনি। এসব যে প্রকৃত শিক্ষার অভাবে হয়েছে সেটা বলার অপেক্ষা রাখে না।  
    আর বর্তমান দিনে নারী দিবস আর পাঁচটা অনুষ্ঠানের মতো হয়েছে। শুধু নাচ-গান ও খাওয়ার মধ্যেই সীমিত হয়ে পড়েছে। যাঁরা এই অধিকারের জন্য সংগ্রাম করেছেন তাঁদের অবদানের স্বীকৃতি ব্রাত্য। এই ব্রাত্যতা যদি দীর্ঘস্থায়ী হয় তাহলে কিন্তু ফিরে পাওয়া অধিকার আবার হারিয়ে যাবার জন্য সময় লাগবেনা। কারণ, পুরুষতান্ত্রিক সমাজ ব্যবস্থা  টিকে রাখার জন্য সব রকমের চেষ্টা করেছে। বিজ্ঞাপনের জগতে নারীর শরীর প্রদর্শন এক পণ্যে পরিণত হয়েছে। তাই অধিকার সুপ্রতিষ্ঠিত করে রাখার জন্য সংগ্রাম জারি রাখতে হবে।





Read More

Sunday, 1 March 2020

// // Leave a Comment

ইতিহাসের প্রেক্ষাপটে নারীর সার্বিক মুক্তির ক্ষেত্রে পিছিয়ে রাখা সমাজের মহামানব ও মহীয়সী নারীদের অবদান। লেখক – জগদীশচন্দ্র রায়



ইতিহাসের প্রেক্ষাপটে নারীর সার্বিক মুক্তির ক্ষেত্রে পিছিয়ে রাখা সমাজের
মহামানব ও মহীয়সী নারীদের অবদান।
লেখক – জগদীশচন্দ্র রায়
 ভূমিকাঃ- কবির ভাষায়, বিশ্বের যা কিছু সৃষ্টি হয়েছে, অর্ধেক তার রচিয়াছে নারী, অর্ধেক তার নর। আর পতিত পাবন হরিচাঁদের কথায়-
                          সমাজে পুরুষ পাবে যেই অধিকার।
                          নারীও পাইবে তাহা করিলে বিচার।
    এই বিশ্বের সব কিছু গড়ার কারিগর হচ্ছে নারী ও পুরুষ। উভয়ের প্রচেষ্টা বিনা কোনো কিছু গড়ে তোলা সম্ভব নয়। তাই নারী ও পুরুষ উভয়ে সমান। তবে প্রকৃত বিচার করলে সন্তান ধারনের ক্ষেত্রে নারী একমাত্র ক্ষমতাশালী। যেটা পুরুষের ক্ষেত্রে সম্ভব নয়।
    কিন্তু প্রাচীন কাল থেকে শুরু করে বর্তমান কাল পর্যন্ত বিচার করলে দেখতে পাই- পূর্বে ছিল মাতৃতান্ত্রিক সমাজ ব্যবস্থা। সেখানে মা’ ই ছিল কর্তা। কিন্তু পরবর্তীতে সেই ক্ষমতা চলে আসে পুরুষের কাছে। পুরুষ নিজের আধিপত্বকে বজায় রাখার জন্য শুরু করে নারীর সমস্ত অধিকারের হরণ। ফলে নারী হয়ে পড়ে শুধুমাত্র সন্তান উৎপাদনের মেশিন মাত্র। আর পুরুষের ইচ্ছা পূরণের যন্ত্র। সেখানে নারীকে মানুষের মর্যাদা থেকে নামিয়ে আনা হয় পশুর পর্যায়ে। নারীর প্রতি সব ধরনের প্রতিবন্ধকতার সৃষ্টি করা হয়। শাস্ত্র লিখে নারীর সমস্ত অধিকারকে ক্ষুন্ন করেছে।
     পৃথিবী বিবর্তনশীল। তাই বিভিন্ন বিবর্তনের মধ্যে নারীর সামাজিক বিবর্তনের জন্য কালের পরিপ্রেক্ষিতে আমরা দেখতে পাই, অনেকেই এগিয়ে এসেছেন। তারমধ্যে সমাজের পিছিয়ে পড়া মহিলাদের মুক্তির জন্য, তাদের সামাজিক অধিকার পুনঃ প্রতিষ্ঠার জন্য শুরু হয় সংগ্রাম। এই সংগ্রামের ক্ষেত্রে আমরা দেখতে পাই-

(১) সাবিত্রি মাতা ফুলেঃ-
      সাবিত্রি মাতা ফুলের বাল্যকালেই বিবাহ হয়। কিন্তু জীবন সাথী, জ্যোতিরাও ফুলে তাঁকে ঘরে বসেই পাঠ দান করান। তিনি ধীরে ধীরে অক্ষর জ্ঞানের অধিকারী হন। পরবর্তীতে তিনি ব্রত গ্রহণ করেন সমাজের সমস্ত প্রতিকূলতার মোকাবিলা করে সমাজের নারীদের শিক্ষিত করে গোড়ে তুলতে হবে।
      জ্যোতিরাও ফুলে, সাবিত্রীকে প্রথমে শিক্ষিত করে তোলেন। আর 18 বছর বয়সে শিক্ষিকা রূপে ভারতের অনাবাদী জঙ্গলময় অশিক্ষার ভূমিতে প্রথমে স্ত্রী শিক্ষার চারা গাছ রোপন করেন। আর ধীরে ধীরে সেই শিক্ষার চারা গাছ বিশাল বটবৃক্ষের মত বিস্তারলাভ করে। তো এরকম বিদূষী মাতা সাবিত্রীর অতুলনীয় অবদানকে কেউ কি বিস্মৃত হতে পারে?
  ভারতবর্ষে হাজার বছর ধরে শোষিত বঞ্চিত, আদিবাসী ও অতি পিছিয়ে পড়া শ্রেণিকে শিক্ষার আলো থেকে বহু যোজন দূরে সরিয়ে রেখেছিল ব্রাহ্মণ্যবাদী ব্যবস্থা। সেই শিক্ষার আলোকে তিনি এই বঞ্চিতদের ঘরে ঘরে পৌঁছে দেওয়ার জন্য প্রতিজ্ঞাবদ্ধ হন। শিক্ষা গ্রহণের অধিকারকে হাজার বছর ধরে ষড়যন্ত্র করে বন্ধ করে রাখার ফলে জঞ্জালের পাহাড় জমে ছিল, সেই জঞ্জালকে এক ঝকটায় সরিয়ে দিয়ে তিনি শিক্ষার বীজ বপন করতে শুরু করেন।
হাজার বছর ধরে শিক্ষা থেকে বঞ্চিত করে রাখা সর্ব শ্রেণীর স্ত্রীদের জন্য তিনি যখন এক ঝটকায় শিক্ষার দরজাকে লাথি মেরে উন্মুক্ত করে দেন; তখন শিক্ষার বন্ধ দরজা খোলার আওয়াজ শুনে পুনের ব্রাহ্মণ্যবাদীদের কান ফেটে যায়। তাদের কাছে বজ্রাঘাতের মত এই ঘটনা মনে হয়। তখন তারা অমানবিক সামন্ততাত্রিক প্রথার ঘুমন্ত সিংহ কে জাগিয়ে তোলে। তারা মাতা সাবিত্রী ফুলে ও মহাত্মা জ্যোতিরাও ফুলের উপর বিভিন্নভাবে প্রাণ নাশের চেষ্টা চালায়।
    সাবিত্রী ও জ্যোতিরাও দ্বারা প্রজ্বলিও শিক্ষার জ্যোতিকে নিভিয়ে দেওয়ার জন্য ব্রাহ্মণ্যবাদীরা জ্যোতিরাও এর পিতা গোবিন্দ রাও কে ধমকী দিয়ে ভয় দেখিয়ে জ্যোতিরাও কে ঘর থেকে বের করার কাজে সফল হয়। ঘর ছাড়া হয়েও সাবিত্রী ও জ্যোতিরাও তাঁদের শিক্ষা প্রদানের কাজ চালিয়ে যান।
    মাতা সাবিত্রি যখন মহিলাদের লেখাপড়া শেখানোর জন্য বাইরে যেতেন, তখন তাঁর উপর ব্রাহ্মণ্যবাদীরা গোবর ও পাথর ছুড়ে মারত। তাঁকে রাস্তায় চলার সময় বাঁধা সৃষ্টি করে উঁচু জাতির গুন্ডারা খারাপ খারাপ গালি দিত। এমনকি তাঁকে মেরে ফেলারও ধমকি দিত। মহিলাদের জন্য চালানো স্কুল বন্ধ করার চেষ্টা করত। সাবিত্রী এদের ধমকীতে যাতে ভয় পেয়ে ঘরে বসে যান, সেই চেষ্টা করত। এমনকি ব্রাহ্মণ্যবাদী অনেক নিয়ম তুলে নরকে যাওয়ার ভয়ও দেখাত। এরকমই এক বদমাশ প্রায় প্রতিদিনই সাবিত্রির পিছে পিছে এসে উত্যক্ত করত। একদিন তো ঐ বদমাশ হঠাৎ সাবিত্রীর রাস্তা বন্ধ করে দাঁড়ায়। আর শারীরিকভাবে আক্রমন করে। তখন সাবিত্রি দুঃসাহস করে ঐ বদমাশকে থাপ্পড় লাগান। থাপ্পড় খেয়ে বদমাশ আর দ্বিতীয় বার সাবিত্রীর সামনে আসেনি।
     সাবিত্রি মাতার এই নারী শিক্ষার আন্দোলনের আর একজন সহযোগী ছিলেন ফতেমা শেখ। তিনি সাবিত্রি মাতার সঙ্গে সদাসর্বদা সহযোগীতার হাত বাড়িয়ে দেন।
 (২) হরিচাঁদ ও গুরুচাঁদ ঠাকুরঃ-
     পতিত পাবন হরিচাঁদ ঠাকুর তাঁর সামাজিক ও ধর্মীয় কর্মের মধ্য দিয়ে কখনো নারী পুরুষের মধ্যে ভেদাভেদ রাখেননি। তিনি নিজে শিক্ষার আন্দোলন করতে না পারলেও স্বীয় পুত্র গুরুচাঁদ ঠাকুরের উপর সেই গুরুদায়িত্ব সপে যান।  
   গুরুচাঁদ ঠাকুর পিতৃ আজ্ঞাকে শিরোধার্য করে সমাজ জাগরণের জন্য সংগ্রাম শুরু করেন।

     শিক্ষার আন্দোলনঃ- গুরুচাঁদ ঠাকুর একাধারে যেমন ছিলেন প্রথাগত (একাডেমিক) শিক্ষার প্রসারের অগ্রদূত। তেমনি তিনি অন্য দিকে ছিলেন সামাজিক শিক্ষার ধারক ও বাহকঅর্থাৎ Education for earning and education for learning. গুধুমাত্র একাডেমিক শিক্ষায় শিক্ষিত হলেই সে প্রকৃত শিক্ষার অধিকারী হতে পারেনা; সঙ্গে প্রয়োজন সামাজিক শিক্ষায় শিক্ষিত হওয়া। তিনি চেয়েছিলেন শুধু পুথিগত শিক্ষায় নয়, সামাজিক শিক্ষায় শিক্ষিত পূর্ণ মানুষ, কুসংস্কার মুক্ত মানুষন গড়ে তুলতে। শিক্ষার প্রসারের জন্য তাঁর শ্লোগান ছিল-
                         খাও বা না খাও তা’তে কোন দুঃখ নাই।
                        ছেলে পিলে শিক্ষা দেও এই আমি চাই।।  -গুরুচাঁদ চরিত- পৃঃ ১৪৪
তিনি বুঝতে পেরেছিলেন অশিক্ষা হচ্ছে মারণ রোগ। তার জন্য তিনি ঘোষণা করলেন, খেতে না পাওয়ার অভাব থেকে অশিক্ষার অভাব আরো অনেক বড়। তাই যেকোনো পরিস্থিতিতে সন্তানদের শিক্ষিত করতে হবে। প্রয়োজনে ভিক্ষা করেও অশিক্ষার অন্ধকারকে দূর করতে হবে।
বালক বালিকা দোঁহে পাঠশালে দাও।
লোকে বলে “মা’র গুণে ভাল হয় ছা’ও।। (পৃঃ ৫২৯)
তিনি সকলের জন্য বিদ্যা অর্জনের উপর জোর দেন। আর গ্রামে গ্রামে পাঠশালা করার আহ্বান জানান। নারীকেও শিক্ষিত হওয়ার কথা বলেন। কারণ, মা’ শিক্ষিত হলে সন্তানও শিক্ষিত হবে।
১৮৮০ (১২৮৭ বাংলা) সালে নভেম্বর মাসে অনুন্নত শ্রেণির জন্য ১ম পাঠশালা তৈরী করা হয়।
বিদ্যার কারণে দান দানের প্রধান।
বিদ্যাহীন নর দেখ পশুর সমান।। -গুরুচাঁদ চরিত -৫৩০
     যিনি বিদ্যা লাভ করেছেন, তিনি যদি অন্যকে সেই বিদ্যা দান করেন তাহলে সেই দানের ফলে দেশ, সমাজ ও জাতির প্রগতি হবে। সমস্ত বাঁধার অন্ধকার দূর হয়ে জ্ঞানের আলো ফুটে উঠবে। তিনি বিদ্যাহীন মানুষকে পশুর সঙ্গে তুলনা করেছেন। শিক্ষিত হলে সমাজের অন্ধ ধর্মীয় শৃঙ্খল থেকে মুক্ত হওয়ার জন্য সংগ্রাম করা যাবে। গোলামী থেকে মুক্ত হওয়া যাবে।
তিনি আরো বললনে-               কুসংস্কার আছে যত      দূর কর’ অবিরত
                                     বিদ্যা শিক্ষা কর ঘরে ঘরে। গুরুচাঁদ চরিত পৃ.১১৯

কুসংস্কার হচ্ছে সমাজের ক্ষতিকারক ভাইরাস। এই ভাইরাস থেকে প্রতি নিয়ত দূরে থাকতে হবে। আর তার জন্য ঘরে ঘরে শিক্ষার আলো জ্বালাতে হবে।
নারী শিক্ষার জন্য গুরুচাঁদ ঠাকুর নিজের বাড়িতেই ‘শান্তি-সত্যভামা’ নামে স্কুল গড়ে তোলেন।


(৩) বাবা সাহবে আম্বেদকরঃ-
বাবা সাহবে আম্বদেকর একজন সূর্য। সেই সূর্যকে পূর্ণ প্রকাশের জন্য ব্রাহ্মণ্যবাদী ঘনকালো মেঘকে সরিয়ে তাঁকে সংবিধান সভায় প্রেরণ করেন বাংলার ‘আম্বেদকর’ মহাপ্রাণ যোগেন্দ্রনাথ মণ্ডল। যার অক্লান্ত সংগ্রামের ফলে এই অসাধ্য সাধন সম্ভব হয়। যদিও বাংলার মানুষ এই মহান মহামানবদ্বয়ের সংগ্রামের ফসল ‘সংরক্ষণ- representation’ কে তো  ভোগ করছে, কিন্তু যাদের জন্য এই মহার্ঘ তাদের আজও আপন করে নিতে পারেনি।
    অবদানঃ-  ড. আম্বেদকরের ভারতের বিকাশের ক্ষেত্রে যতোটা যোগদান আছে হয়তো অন্য কোনো রাজনেতার সেটা নেই। তিনি আধুনিক ভারতের নির্মাতা। তিনি সংবিধান রচনা সমিতির অধ্যক্ষ ছিলেন। তিনি এমন সংবিধান রচনা করেছেন, যেখানে সকল নাগরিক সমান অধিকারী, ধর্মনিরপেক্ষ। বাস্তবে তিনি স্বাধীন ভারতের ডি.এন.এ. রচনা করেছিলেন সংবিধানের মাধ্যমে।

  নারী ও শ্রমিকদের সুবিধাঃ- বাবা সাহবে হিন্দুকোড বিল বানিয়েছিলেন নারীদের সমমর্যাদার অধিকার দেওয়ার জন্য। পিতার সম্পত্তিতে কন্যার সমান অধিকার, বিবাহিত পুরুষ এক স্ত্রী বর্তমান থাকতে অন্য স্ত্রীকে গ্রহণ করতে পারবেনা। যদিও তখনকার সরকার সেটার মান্যতা দেয়নি। পরবর্তীতে সেটা চালু করা হয়। মহিলাদের মাতৃত্বকালী ছুটি, এবং প্রতিদিন আট ঘন্টা কাজের সময় নির্ধারণ বাবা সাহেবের অবদান। তিনি যখন শ্রমসচিব (মন্ত্রী) তখন (১)কয়লা শ্রমিকদের নানা ধরনের সহায়তা প্রদান, (২) মহিলা শ্রমিকদের প্রসবকালীন ৩২৯দিন ছুটি, (৩) কর্ম বিনিয়োগ কেন্দ্র, (৪) ৮ ঘণ্টা কাজের আইনী স্বীকৃতি, (৫) ট্রেড ইউনিয়ন অধিকার সম্প্রসারণ, (৬) ন্যূনতম বেতন সহ নানা শ্রমিক  কল্যাণ আইন পাস ও কার্যকর করেন।
     উপরে উল্লেখিত এই মহামনীষী যেমন নারী মুক্তির সংগ্রাম করেছে, তেমনি আরো অনেকে কম বেশি এই কাজ করেছেন। তবে পিছিয়ে পড়া শ্রেণির মুক্তির জন্য কিন্তু এনাদে অবদান অসামান্য।
   এই আলোচনা শুধু আলোচনার জন্য নয়। এই আলোচনা থেকে যদি নারী আপন অধিকার বুঝতে পারে ও নিজের জীবন ও সমাজ জীবনে এর প্রভাত স্থাপিত করতে পারে তবেই এই আলোচনা স্বার্থ হবে।


Read More