Sunday, 14 June 2026

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क्या 1950 और 1956 के बीच जोगेंद्रनाथ और बाबासाहेब अंबेडकर के बीच कोई संपर्क या संबंध था? इतिहास क्या कहता है?

 


क्या 1950 और 1956 के बीच   जोगेंद्रनाथ और बाबासाहेब अंबेडकर के बीच कोई संपर्क या संबंध था? इतिहास क्या कहता है?

लेखक – जगदीशचंद्र राय

(मुख्य रूप से विभिन्न ऐतिहासिक स्रोतों से जानकारी संकलित कर यह लेख प्रस्तुत किया गया है।)

हाल के समय में महाप्राण जोगेन्द्रनाथ मंडल और बाबासाहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर के संबंधों को लेकर एक प्रश्न के आधार पर विवाद खड़ा किया गया है। प्रश्न यह है कि वर्ष 1950 से 6 दिसंबर 1956 अर्थात बाबासाहेब के निधन तक इन दोनों महान नेताओं के बीच कोई संपर्क था या नहीं।

सबसे पहले यह याद रखना आवश्यक है कि उस समय दोनों में से कोई भी किसी सरकारी पद पर आसीन नहीं थे। इसलिए उनके पारस्परिक संपर्कों से संबंधित सरकारी अभिलेख या प्रशासनिक दस्तावेज़ स्वाभाविक रूप से बहुत कम उपलब्ध हैं। इसके अतिरिक्त जीवन के उस दौर में दोनों ही व्यक्तिगत, राजनीतिक और संगठनात्मक अनेक चुनौतियों से गुजर रहे थे। इसलिए केवल लिखित संपर्कों की कमी के आधार पर उनके संबंधों अथवा आपसी सम्मान पर प्रश्न उठाना इतिहास के प्रति न्यायसंगत नहीं कहा जा सकता।

भारत के शोषित, वंचित और समाज के हाशिये पर रहने वाले समुदायों के अधिकारों की स्थापना के इतिहास में जोगेन्द्रनाथ मंडल और डॉ. आंबेडकर का नाम अविभाज्य रूप से जुड़ा हुआ है। जीवनभर संघर्ष करते हुए उन्होंने अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST), अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) तथा समाज के सभी पिछड़े वर्गों के संवैधानिक अधिकारों को सुनिश्चित करने के आंदोलन का नेतृत्व किया। साथ ही महिलाओं के सामाजिक और संवैधानिक अधिकारों की स्थापना में भी उनका योगदान इतिहास के स्वर्णिम अध्यायों में दर्ज है।

किन्तु दुर्भाग्यपूर्ण रूप से आज उनके महान योगदान को चर्चा का केंद्र बनाने के बजाय यह प्रश्न उठाया जा रहा है कि जीवन के अंतिम समय में वे नियमित रूप से संपर्क में क्यों नहीं रहे। अनेक लोगों को ऐसा प्रतीत होता है कि जानबूझकर इस प्रश्न को आगे लाकर इन दोनों महापुरुषों के ऐतिहासिक योगदान को छिपाने का प्रयास किया जा रहा है। जबकि इतिहास का मूल्यांकन उनके कार्यों, संघर्षों और उपलब्धियों के आधार पर होना चाहिए, न कि किसी एक पृथक घटना के आधार पर।

इस संदर्भ में एक महत्वपूर्ण जानकारी सदानंद विश्वास द्वारा लिखित पुस्तक महाप्राण जोगेन्द्रनाथ, बंग-भंग और अन्य प्रसंग’ के पृष्ठ संख्या 6 और 7 में मिलती है।

पिछली शताब्दी के पचास के दशक के मध्य में प्रसिद्ध समाजवादी नेता डॉ. राम मनोहर लोहिया ने देश के शोषित और उपेक्षित लोगों की मुक्ति तथा उनके राजनीतिक एवं सामाजिक अधिकारों की स्थापना के उद्देश्य से एक व्यापक एकता स्थापित करने की पहल की। इस विषय पर उन्होंने बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर के साथ पत्राचार द्वारा चर्चा प्रारंभ की तथा इस पहल के संबंध में जोगेन्द्रनाथ मंडल को भी अवगत कराया गया।

डॉ. लोहिया का सपना था कि देश के विभिन्न भागों में वंचित लोगों के हित में कार्य करने वाले संगठनों और राजनीतिक शक्तियों को डॉ. आंबेडकर के नेतृत्व में एक संयुक्त मंच पर लाया जाए। इसी उद्देश्य को लेकर वर्ष 1956 के अंत में बिहार के पटना में एक तैयारी बैठक का आयोजन किया गया। महाप्राण जोगेन्द्रनाथ मंडल उसमें उपस्थित थे और उन्होंने सक्रिय भूमिका निभाई। किन्तु शारीरिक अस्वस्थता के कारण डॉ. आंबेडकर उस बैठक में उपस्थित नहीं हो सके। परिणामस्वरूप उस सभा की अध्यक्षता डॉ. राम मनोहर लोहिया ने की।

इससे पहले भी कई बार प्रयास करने के बावजूद जोगेन्द्रनाथ मंडल डॉ. आंबेडकर से प्रत्यक्ष भेंट नहीं कर सके। बाबासाहेब के व्यस्त कार्यक्रम और अस्वस्थ स्वास्थ्य के कारण यह अवसर बार-बार टलता रहा। इसलिए उन्हें आशा थी कि पटना के इस सम्मेलन में दोनों के बीच विस्तृत चर्चा होगी और भविष्य की कार्ययोजना के लिए उन्हें आवश्यक मार्गदर्शन प्राप्त होगा।

उल्लेखनीय है कि देश विभाजन के बाद अनुसूचित फेडरेशन का केंद्रीय कार्यालय तथा संगठनात्मक संसाधन ढाका स्थानांतरित हो गए थे। संगठन के अधिकांश समर्थक पूर्वी पाकिस्तान के अंतर्गत आने वाले क्षेत्रों में रह जाने के कारण स्वतंत्रता के बाद पश्चिम बंगाल में फेडरेशन की गतिविधियाँ लगभग समाप्त होने की स्थिति में पहुँच गई थीं। ऐसी जटिल परिस्थितियों में संगठन के पुनर्गठन और भविष्य की योजनाओं को लेकर डॉ. आंबेडकर के साथ विचार-विमर्श करना जोगेन्द्रनाथ मंडल के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण था।

किन्तु नियति को कुछ और ही स्वीकार था। अचानक डॉ. आंबेडकर की स्वास्थ्य स्थिति बिगड़ गई और लंबे समय से अपेक्षित वह चर्चा संभव नहीं हो सकी। पटना के कार्यक्रम को संक्षिप्त करके जोगेन्द्रनाथ मंडल अपने प्रिय नेता और आजीवन संघर्ष के साथी से मिलने के लिए शीघ्र ही दिल्ली पहुँचे।

दिल्ली पहुँचकर जब उन्होंने डॉ. आंबेडकर की शारीरिक स्थिति देखी तो वे अत्यंत दुःखी हो गए। उन्होंने महसूस कर लिया था कि अब समय बहुत कम बचा है। और वास्तव में कुछ ही दिनों बाद 6 दिसंबर 1956 की रात्रि में निद्रा अवस्था में भारत के शोषित और वंचित लोगों की मुक्ति के महानायक बाबासाहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर ने इस संसार को सदैव के लिए अलविदा कह दिया।

इस समाचार से महाप्राण जोगेन्द्रनाथ मंडल गहरे शोक में डूब गए। कई दिनों तक उनकी रातें जागते हुए बीतीं। कोलकाता के 64 नंबर सुल्तान आलम रोड स्थित उनके निवास पर उनके अनुयायियों ने उनकी अध्यक्षता में एक शोकसभा आयोजित की। किन्तु उस सभा में शोकाकुल जोगेन्द्रनाथ मंडल एक शब्द भी नहीं बोल सके। उनका गला भर आया था। अपने प्रिय नेता, संघर्ष के सहयात्री और शोषित समाज की मुक्ति के एक महान वृक्ष को खोने का दुःख व्यक्त करने की शक्ति उनमें नहीं थी।

अतः उपलब्ध ऐतिहासिक तथ्यों से स्पष्ट होता है कि अंतिम जीवनकाल में दोनों के बीच संपर्क पूरी तरह समाप्त हो गया था—ऐसा निष्कर्ष निकालना उचित नहीं है। बल्कि अनेक प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद जोगेन्द्रनाथ मंडल डॉ. आंबेडकर से संपर्क और परामर्श करने का प्रयास करते रहे। उनके संबंधों का वास्तविक मूल्यांकन करने के लिए किसी सीमित विवाद पर नहीं, बल्कि शोषित एवं वंचित लोगों के अधिकारों की स्थापना हेतु उनके आजीवन संघर्ष और संयुक्त ऐतिहासिक योगदान पर ध्यान देना अधिक आवश्यक है।

 

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মহাপ্রাণ যোগেন্দ্রনাথ ও বাবাসাহেব আম্বেদকরের মধ্যে ১৯৫০ থেকে ৫৬ সালের মধ্যে কোনো যোগাযোগ বা সম্পর্ক ছিল কি? ইতিহাস কী বলে।

 


মহাপ্রাণ যোগেন্দ্রনাথ ও বাবাসাহেব আম্বেদকরের মধ্যে ১৯৫০ থেকে ৫৬ সালের মধ্যে কোনো যোগাযোগ বা সম্পর্ক ছিল কি? ইতিহাস কী বলে।

লেখক- জগদীশচন্দ্র রায় (মূলত তথ্য সংগ্রহ করে প্রতিবেদেনটি তুলে ধরা হয়েছে।)

সাম্প্রতিক সময়ে মহাপ্রাণ যোগেন্দ্রনাথ মণ্ডল এবং বাবাসাহেব ড. ভীমরাও আম্বেদকরের সম্পর্ক নিয়ে একটি প্রশ্নকে কেন্দ্র করে বিতর্ক সৃষ্টি করা হয়েছে। প্রশ্নটি হলো—১৯৫০ সাল থেকে ১৯৫৬ সালের ৬ ডিসেম্বর, অর্থাৎ বাবাসাহেবের মৃত্যুর পূর্ব মুহূর্ত পর্যন্ত এই দুই মহান নেতার মধ্যে কোনো যোগাযোগ ছিল কি না।

প্রথমেই মনে রাখা প্রয়োজন, ওই সময়ে তাঁরা কেউই কোনো সরকারি পদে অধিষ্ঠিত ছিলেন না। ফলে তাঁদের পারস্পরিক যোগাযোগের সরকারি নথি বা প্রশাসনিক দলিল স্বাভাবিকভাবেই খুব কম পাওয়া যায়। তদুপরি, জীবনের সেই পর্যায়ে তাঁরা উভয়েই ব্যক্তিগত, রাজনৈতিক ও সাংগঠনিক নানা সংকটের মধ্য দিয়ে অতিক্রম করছিলেন। তাই কেবলমাত্র লিখিত যোগাযোগের অভাবকে ভিত্তি করে তাঁদের সম্পর্ক বা পারস্পরিক শ্রদ্ধাবোধ নিয়ে প্রশ্ন তোলা ইতিহাসের প্রতি সুবিচার নয়।

ভারতের নিপীড়িত, বঞ্চিত ও প্রান্তিক জনগোষ্ঠীর অধিকার প্রতিষ্ঠার ইতিহাসে যোগেন্দ্রনাথ মণ্ডল ও ড. আম্বেদকরের নাম অবিচ্ছেদ্যভাবে জড়িয়ে আছে। আজীবন সংগ্রামের মাধ্যমে তাঁরা তফসিলি জাতি (SC), তফসিলি জনজাতি (ST), অন্যান্য অনগ্রসর শ্রেণি (OBC) এবং সমাজের সকল পিছিয়ে পড়া মানুষের সাংবিধানিক অধিকার নিশ্চিত করার লড়াইয়ে নেতৃত্ব দিয়েছেন। একই সঙ্গে নারীর সামাজিক ও সাংবিধানিক অধিকার প্রতিষ্ঠার ক্ষেত্রেও তাঁদের অবদান ইতিহাসে স্বর্ণাক্ষরে লিপিবদ্ধ হয়ে আছে।

কিন্তু দুঃখজনকভাবে, তাঁদের অসামান্য অবদানকে আলোচনার কেন্দ্রবিন্দুতে না রেখে আজ প্রশ্ন তোলা হচ্ছে—শেষ জীবনে তাঁরা কেন নিয়মিত যোগাযোগ রাখেননি? অনেকের কাছে মনে হচ্ছে, সচেতনভাবেই এই প্রশ্নকে সামনে এনে দুই মহামানবের ঐতিহাসিক অবদানকে আড়াল করার চেষ্টা করা হচ্ছে। অথচ ইতিহাসের মূল্যায়ন হওয়া উচিত তাঁদের কর্ম, সংগ্রাম ও অর্জনের ভিত্তিতে; কোনো বিচ্ছিন্ন ঘটনার ওপর নয়।

এই প্রসঙ্গে একটি গুরুত্বপূর্ণ তথ্য পাওয়া যায় সদানন্দ বিশ্বাস রচিত মহাপ্রাণ যোগেন্দ্রনাথ, বঙ্গভঙ্গ ও অন্যান্য প্রসঙ্গ’ গ্রন্থে পৃষ্ঠ নং ৬ ও ৭।

গত শতকের পঞ্চাশের দশকের মাঝামাঝি সময়ে বিশিষ্ট সমাজতান্ত্রিক নেতা ড. রাম মনোহর লোহিয়া দেশের নিপীড়িত ও অবহেলিত মানুষের মুক্তি এবং তাঁদের রাজনৈতিক-সামাজিক অধিকার প্রতিষ্ঠার লক্ষ্যে একটি বৃহত্তর ঐক্য গড়ে তোলার উদ্যোগ গ্রহণ করেন। এই বিষয়ে তিনি বাবাসাহেব ড. আম্বেদকরের সঙ্গে পত্রযোগে আলোচনা শুরু করেন এবং সেই উদ্যোগ সম্পর্কে যোগেন্দ্রনাথ মণ্ডলকেও অবহিত করা হয়।

ড. লোহিয়ার স্বপ্ন ছিল, দেশের বিভিন্ন প্রান্তে বঞ্চিত মানুষের স্বার্থে কাজ করা সংগঠন ও রাজনৈতিক শক্তিগুলোকে ড. আম্বেদকরের নেতৃত্বে একটি ঐক্যবদ্ধ প্ল্যাটফর্মে নিয়ে আসা। সেই লক্ষ্যকে সামনে রেখে ১৯৫৬ সালের শেষ দিকে বিহারের পাটনায় একটি প্রস্তুতি সভার আয়োজন করা হয়। মহাপ্রাণ যোগেন্দ্রনাথ মণ্ডল সেখানে উপস্থিত ছিলেন এবং সক্রিয় ভূমিকা পালন করেন। কিন্তু শারীরিক অসুস্থতার কারণে ড. আম্বেদকর সেই সভায় যোগ দিতে পারেননি। ফলে ড. রাম মনোহর লোহিয়াই সভায় সভাপতিত্ব করেন।

এর আগেও কয়েকবার চেষ্টা করেও যোগেন্দ্রনাথ মণ্ডল ড. আম্বেদকরের সঙ্গে সরাসরি সাক্ষাৎ করতে পারেননি। বাবাসাহেবের ব্যস্ত কর্মসূচি ও শারীরিক অসুস্থতা সেই সুযোগকে বারবার ব্যাহত করেছিল। তাই তিনি আশা করেছিলেন, পাটনার এই সম্মেলনেই তাঁদের মধ্যে দীর্ঘ আলোচনা হবে এবং ভবিষ্যৎ কর্মপন্থা নির্ধারণে তিনি প্রয়োজনীয় দিকনির্দেশনা পাবেন।

উল্লেখ্য, দেশভাগের পর তফসিলি ফেডারেশনের কেন্দ্রীয় কার্যালয় ও সাংগঠনিক সম্পদ ঢাকায় স্থানান্তরিত হয়। সংগঠনের অধিকাংশ সমর্থকও পূর্ব পাকিস্তনের অন্তর্ভুক্ত অঞ্চলে থেকে যাওয়ায় স্বাধীনোত্তর পশ্চিমবঙ্গে ফেডারেশনের কার্যক্রম প্রায় বিলুপ্তির মুখে পড়ে। এই জটিল পরিস্থিতিতে সংগঠন পুনর্গঠন ও ভবিষ্যৎ কর্মসূচি নিয়ে ড. আম্বেদকরের সঙ্গে আলোচনা যোগেন্দ্রনাথের কাছে ছিল অত্যন্ত গুরুত্বপূর্ণ।

কিন্তু নিয়তি যেন অন্য কিছু লিখে রেখেছিল। হঠাৎ করেই ড. আম্বেদকরের শারীরিক অবস্থার অবনতি ঘটে। ফলে বহুদিনের প্রত্যাশিত সেই আলোচনা আর সম্ভব হয়নি। পাটনার কর্মসূচি সংক্ষিপ্ত করে যোগেন্দ্রনাথ দ্রুত দিল্লিতে পৌঁছান তাঁর প্রিয় নেতা ও আজীবন সংগ্রামের সহযোদ্ধার সঙ্গে দেখা করার জন্য।

দিল্লিতে গিয়ে ড. আম্বেদকরের শারীরিক অবস্থা দেখে তিনি গভীরভাবে মর্মাহত হন। তিনি উপলব্ধি করেছিলেন, সময় আর খুব বেশি নেই। আর সত্যিই, অল্প কয়েকদিনের মধ্যেই ১৯৫৬ সালের ৬ ডিসেম্বরের গভীর রাতে ঘুমের মধ্যেই চিরবিদায় নেন ভারতবর্ষের নিপীড়িত মানুষের মুক্তির অন্যতম শ্রেষ্ঠ কণ্ঠস্বর, বাবাসাহেব ড. ভীমরাও আম্বেদকর।

এই সংবাদে কান্নায় ভেঙ্গে পড়লেন মহাপ্রাণ যোগেন্দ্রনাথ - দিনের পর দিন কাটলো তাঁর বিনিদ্র রাত। কলকাতার ৬৪ নম্বর সুলতান আলম রোডে তাঁর অনুগামীরা তাঁকে সভাপতিত্বে রেখে একটি শোকসভার আয়োজন করেন। কিন্তু সেই সভায় শোকাহত যোগেন্দ্রনাথ মণ্ডল একটি শব্দও উচ্চারণ করতে পারেননি। তাঁর কণ্ঠরুদ্ধ হয়ে এসেছিল। প্রিয় নেতা, সংগ্রামের সহযাত্রী এবং নিপীড়িত মানুষের মুক্তির এক মহীরুহকে হারানোর বেদনা ভাষায় প্রকাশ করার শক্তি তাঁর ছিল না।

সুতরাং, ইতিহাসের প্রাপ্ত তথ্য থেকে স্পষ্ট যে, শেষ জীবনে যোগাযোগ বিচ্ছিন্ন ছিল—এমন সিদ্ধান্তে পৌঁছানো সঠিক নয়। বরং নানা প্রতিকূলতা সত্ত্বেও যোগেন্দ্রনাথ মণ্ডল ড. আম্বেদকরের সঙ্গে যোগাযোগ ও পরামর্শের চেষ্টা চালিয়ে গিয়েছিলেন। তাঁদের সম্পর্কের প্রকৃত মূল্যায়ন করতে হলে বিচ্ছিন্ন বিতর্ক নয়, বরং নিপীড়িত মানুষের অধিকার প্রতিষ্ঠার জন্য তাঁদের আজীবন সংগ্রাম ও যৌথ ঐতিহাসিক অবদানকে সামনে আনাই অধিকতর প্রয়োজন।

 

 





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