Sunday, 14 June 2026

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क्या 1950 और 1956 के बीच जोगेंद्रनाथ और बाबासाहेब अंबेडकर के बीच कोई संपर्क या संबंध था? इतिहास क्या कहता है?

 


क्या 1950 और 1956 के बीच   जोगेंद्रनाथ और बाबासाहेब अंबेडकर के बीच कोई संपर्क या संबंध था? इतिहास क्या कहता है?

लेखक – जगदीशचंद्र राय

(मुख्य रूप से विभिन्न ऐतिहासिक स्रोतों से जानकारी संकलित कर यह लेख प्रस्तुत किया गया है।)

हाल के समय में महाप्राण जोगेन्द्रनाथ मंडल और बाबासाहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर के संबंधों को लेकर एक प्रश्न के आधार पर विवाद खड़ा किया गया है। प्रश्न यह है कि वर्ष 1950 से 6 दिसंबर 1956 अर्थात बाबासाहेब के निधन तक इन दोनों महान नेताओं के बीच कोई संपर्क था या नहीं।

सबसे पहले यह याद रखना आवश्यक है कि उस समय दोनों में से कोई भी किसी सरकारी पद पर आसीन नहीं थे। इसलिए उनके पारस्परिक संपर्कों से संबंधित सरकारी अभिलेख या प्रशासनिक दस्तावेज़ स्वाभाविक रूप से बहुत कम उपलब्ध हैं। इसके अतिरिक्त जीवन के उस दौर में दोनों ही व्यक्तिगत, राजनीतिक और संगठनात्मक अनेक चुनौतियों से गुजर रहे थे। इसलिए केवल लिखित संपर्कों की कमी के आधार पर उनके संबंधों अथवा आपसी सम्मान पर प्रश्न उठाना इतिहास के प्रति न्यायसंगत नहीं कहा जा सकता।

भारत के शोषित, वंचित और समाज के हाशिये पर रहने वाले समुदायों के अधिकारों की स्थापना के इतिहास में जोगेन्द्रनाथ मंडल और डॉ. आंबेडकर का नाम अविभाज्य रूप से जुड़ा हुआ है। जीवनभर संघर्ष करते हुए उन्होंने अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST), अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) तथा समाज के सभी पिछड़े वर्गों के संवैधानिक अधिकारों को सुनिश्चित करने के आंदोलन का नेतृत्व किया। साथ ही महिलाओं के सामाजिक और संवैधानिक अधिकारों की स्थापना में भी उनका योगदान इतिहास के स्वर्णिम अध्यायों में दर्ज है।

किन्तु दुर्भाग्यपूर्ण रूप से आज उनके महान योगदान को चर्चा का केंद्र बनाने के बजाय यह प्रश्न उठाया जा रहा है कि जीवन के अंतिम समय में वे नियमित रूप से संपर्क में क्यों नहीं रहे। अनेक लोगों को ऐसा प्रतीत होता है कि जानबूझकर इस प्रश्न को आगे लाकर इन दोनों महापुरुषों के ऐतिहासिक योगदान को छिपाने का प्रयास किया जा रहा है। जबकि इतिहास का मूल्यांकन उनके कार्यों, संघर्षों और उपलब्धियों के आधार पर होना चाहिए, न कि किसी एक पृथक घटना के आधार पर।

इस संदर्भ में एक महत्वपूर्ण जानकारी सदानंद विश्वास द्वारा लिखित पुस्तक महाप्राण जोगेन्द्रनाथ, बंग-भंग और अन्य प्रसंग’ के पृष्ठ संख्या 6 और 7 में मिलती है।

पिछली शताब्दी के पचास के दशक के मध्य में प्रसिद्ध समाजवादी नेता डॉ. राम मनोहर लोहिया ने देश के शोषित और उपेक्षित लोगों की मुक्ति तथा उनके राजनीतिक एवं सामाजिक अधिकारों की स्थापना के उद्देश्य से एक व्यापक एकता स्थापित करने की पहल की। इस विषय पर उन्होंने बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर के साथ पत्राचार द्वारा चर्चा प्रारंभ की तथा इस पहल के संबंध में जोगेन्द्रनाथ मंडल को भी अवगत कराया गया।

डॉ. लोहिया का सपना था कि देश के विभिन्न भागों में वंचित लोगों के हित में कार्य करने वाले संगठनों और राजनीतिक शक्तियों को डॉ. आंबेडकर के नेतृत्व में एक संयुक्त मंच पर लाया जाए। इसी उद्देश्य को लेकर वर्ष 1956 के अंत में बिहार के पटना में एक तैयारी बैठक का आयोजन किया गया। महाप्राण जोगेन्द्रनाथ मंडल उसमें उपस्थित थे और उन्होंने सक्रिय भूमिका निभाई। किन्तु शारीरिक अस्वस्थता के कारण डॉ. आंबेडकर उस बैठक में उपस्थित नहीं हो सके। परिणामस्वरूप उस सभा की अध्यक्षता डॉ. राम मनोहर लोहिया ने की।

इससे पहले भी कई बार प्रयास करने के बावजूद जोगेन्द्रनाथ मंडल डॉ. आंबेडकर से प्रत्यक्ष भेंट नहीं कर सके। बाबासाहेब के व्यस्त कार्यक्रम और अस्वस्थ स्वास्थ्य के कारण यह अवसर बार-बार टलता रहा। इसलिए उन्हें आशा थी कि पटना के इस सम्मेलन में दोनों के बीच विस्तृत चर्चा होगी और भविष्य की कार्ययोजना के लिए उन्हें आवश्यक मार्गदर्शन प्राप्त होगा।

उल्लेखनीय है कि देश विभाजन के बाद अनुसूचित फेडरेशन का केंद्रीय कार्यालय तथा संगठनात्मक संसाधन ढाका स्थानांतरित हो गए थे। संगठन के अधिकांश समर्थक पूर्वी पाकिस्तान के अंतर्गत आने वाले क्षेत्रों में रह जाने के कारण स्वतंत्रता के बाद पश्चिम बंगाल में फेडरेशन की गतिविधियाँ लगभग समाप्त होने की स्थिति में पहुँच गई थीं। ऐसी जटिल परिस्थितियों में संगठन के पुनर्गठन और भविष्य की योजनाओं को लेकर डॉ. आंबेडकर के साथ विचार-विमर्श करना जोगेन्द्रनाथ मंडल के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण था।

किन्तु नियति को कुछ और ही स्वीकार था। अचानक डॉ. आंबेडकर की स्वास्थ्य स्थिति बिगड़ गई और लंबे समय से अपेक्षित वह चर्चा संभव नहीं हो सकी। पटना के कार्यक्रम को संक्षिप्त करके जोगेन्द्रनाथ मंडल अपने प्रिय नेता और आजीवन संघर्ष के साथी से मिलने के लिए शीघ्र ही दिल्ली पहुँचे।

दिल्ली पहुँचकर जब उन्होंने डॉ. आंबेडकर की शारीरिक स्थिति देखी तो वे अत्यंत दुःखी हो गए। उन्होंने महसूस कर लिया था कि अब समय बहुत कम बचा है। और वास्तव में कुछ ही दिनों बाद 6 दिसंबर 1956 की रात्रि में निद्रा अवस्था में भारत के शोषित और वंचित लोगों की मुक्ति के महानायक बाबासाहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर ने इस संसार को सदैव के लिए अलविदा कह दिया।

इस समाचार से महाप्राण जोगेन्द्रनाथ मंडल गहरे शोक में डूब गए। कई दिनों तक उनकी रातें जागते हुए बीतीं। कोलकाता के 64 नंबर सुल्तान आलम रोड स्थित उनके निवास पर उनके अनुयायियों ने उनकी अध्यक्षता में एक शोकसभा आयोजित की। किन्तु उस सभा में शोकाकुल जोगेन्द्रनाथ मंडल एक शब्द भी नहीं बोल सके। उनका गला भर आया था। अपने प्रिय नेता, संघर्ष के सहयात्री और शोषित समाज की मुक्ति के एक महान वृक्ष को खोने का दुःख व्यक्त करने की शक्ति उनमें नहीं थी।

अतः उपलब्ध ऐतिहासिक तथ्यों से स्पष्ट होता है कि अंतिम जीवनकाल में दोनों के बीच संपर्क पूरी तरह समाप्त हो गया था—ऐसा निष्कर्ष निकालना उचित नहीं है। बल्कि अनेक प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद जोगेन्द्रनाथ मंडल डॉ. आंबेडकर से संपर्क और परामर्श करने का प्रयास करते रहे। उनके संबंधों का वास्तविक मूल्यांकन करने के लिए किसी सीमित विवाद पर नहीं, बल्कि शोषित एवं वंचित लोगों के अधिकारों की स्थापना हेतु उनके आजीवन संघर्ष और संयुक्त ऐतिहासिक योगदान पर ध्यान देना अधिक आवश्यक है।

 

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মহাপ্রাণ যোগেন্দ্রনাথ ও বাবাসাহেব আম্বেদকরের মধ্যে ১৯৫০ থেকে ৫৬ সালের মধ্যে কোনো যোগাযোগ বা সম্পর্ক ছিল কি? ইতিহাস কী বলে।

 


মহাপ্রাণ যোগেন্দ্রনাথ ও বাবাসাহেব আম্বেদকরের মধ্যে ১৯৫০ থেকে ৫৬ সালের মধ্যে কোনো যোগাযোগ বা সম্পর্ক ছিল কি? ইতিহাস কী বলে।

লেখক- জগদীশচন্দ্র রায় (মূলত তথ্য সংগ্রহ করে প্রতিবেদেনটি তুলে ধরা হয়েছে।)

সাম্প্রতিক সময়ে মহাপ্রাণ যোগেন্দ্রনাথ মণ্ডল এবং বাবাসাহেব ড. ভীমরাও আম্বেদকরের সম্পর্ক নিয়ে একটি প্রশ্নকে কেন্দ্র করে বিতর্ক সৃষ্টি করা হয়েছে। প্রশ্নটি হলো—১৯৫০ সাল থেকে ১৯৫৬ সালের ৬ ডিসেম্বর, অর্থাৎ বাবাসাহেবের মৃত্যুর পূর্ব মুহূর্ত পর্যন্ত এই দুই মহান নেতার মধ্যে কোনো যোগাযোগ ছিল কি না।

প্রথমেই মনে রাখা প্রয়োজন, ওই সময়ে তাঁরা কেউই কোনো সরকারি পদে অধিষ্ঠিত ছিলেন না। ফলে তাঁদের পারস্পরিক যোগাযোগের সরকারি নথি বা প্রশাসনিক দলিল স্বাভাবিকভাবেই খুব কম পাওয়া যায়। তদুপরি, জীবনের সেই পর্যায়ে তাঁরা উভয়েই ব্যক্তিগত, রাজনৈতিক ও সাংগঠনিক নানা সংকটের মধ্য দিয়ে অতিক্রম করছিলেন। তাই কেবলমাত্র লিখিত যোগাযোগের অভাবকে ভিত্তি করে তাঁদের সম্পর্ক বা পারস্পরিক শ্রদ্ধাবোধ নিয়ে প্রশ্ন তোলা ইতিহাসের প্রতি সুবিচার নয়।

ভারতের নিপীড়িত, বঞ্চিত ও প্রান্তিক জনগোষ্ঠীর অধিকার প্রতিষ্ঠার ইতিহাসে যোগেন্দ্রনাথ মণ্ডল ও ড. আম্বেদকরের নাম অবিচ্ছেদ্যভাবে জড়িয়ে আছে। আজীবন সংগ্রামের মাধ্যমে তাঁরা তফসিলি জাতি (SC), তফসিলি জনজাতি (ST), অন্যান্য অনগ্রসর শ্রেণি (OBC) এবং সমাজের সকল পিছিয়ে পড়া মানুষের সাংবিধানিক অধিকার নিশ্চিত করার লড়াইয়ে নেতৃত্ব দিয়েছেন। একই সঙ্গে নারীর সামাজিক ও সাংবিধানিক অধিকার প্রতিষ্ঠার ক্ষেত্রেও তাঁদের অবদান ইতিহাসে স্বর্ণাক্ষরে লিপিবদ্ধ হয়ে আছে।

কিন্তু দুঃখজনকভাবে, তাঁদের অসামান্য অবদানকে আলোচনার কেন্দ্রবিন্দুতে না রেখে আজ প্রশ্ন তোলা হচ্ছে—শেষ জীবনে তাঁরা কেন নিয়মিত যোগাযোগ রাখেননি? অনেকের কাছে মনে হচ্ছে, সচেতনভাবেই এই প্রশ্নকে সামনে এনে দুই মহামানবের ঐতিহাসিক অবদানকে আড়াল করার চেষ্টা করা হচ্ছে। অথচ ইতিহাসের মূল্যায়ন হওয়া উচিত তাঁদের কর্ম, সংগ্রাম ও অর্জনের ভিত্তিতে; কোনো বিচ্ছিন্ন ঘটনার ওপর নয়।

এই প্রসঙ্গে একটি গুরুত্বপূর্ণ তথ্য পাওয়া যায় সদানন্দ বিশ্বাস রচিত মহাপ্রাণ যোগেন্দ্রনাথ, বঙ্গভঙ্গ ও অন্যান্য প্রসঙ্গ’ গ্রন্থে পৃষ্ঠ নং ৬ ও ৭।

গত শতকের পঞ্চাশের দশকের মাঝামাঝি সময়ে বিশিষ্ট সমাজতান্ত্রিক নেতা ড. রাম মনোহর লোহিয়া দেশের নিপীড়িত ও অবহেলিত মানুষের মুক্তি এবং তাঁদের রাজনৈতিক-সামাজিক অধিকার প্রতিষ্ঠার লক্ষ্যে একটি বৃহত্তর ঐক্য গড়ে তোলার উদ্যোগ গ্রহণ করেন। এই বিষয়ে তিনি বাবাসাহেব ড. আম্বেদকরের সঙ্গে পত্রযোগে আলোচনা শুরু করেন এবং সেই উদ্যোগ সম্পর্কে যোগেন্দ্রনাথ মণ্ডলকেও অবহিত করা হয়।

ড. লোহিয়ার স্বপ্ন ছিল, দেশের বিভিন্ন প্রান্তে বঞ্চিত মানুষের স্বার্থে কাজ করা সংগঠন ও রাজনৈতিক শক্তিগুলোকে ড. আম্বেদকরের নেতৃত্বে একটি ঐক্যবদ্ধ প্ল্যাটফর্মে নিয়ে আসা। সেই লক্ষ্যকে সামনে রেখে ১৯৫৬ সালের শেষ দিকে বিহারের পাটনায় একটি প্রস্তুতি সভার আয়োজন করা হয়। মহাপ্রাণ যোগেন্দ্রনাথ মণ্ডল সেখানে উপস্থিত ছিলেন এবং সক্রিয় ভূমিকা পালন করেন। কিন্তু শারীরিক অসুস্থতার কারণে ড. আম্বেদকর সেই সভায় যোগ দিতে পারেননি। ফলে ড. রাম মনোহর লোহিয়াই সভায় সভাপতিত্ব করেন।

এর আগেও কয়েকবার চেষ্টা করেও যোগেন্দ্রনাথ মণ্ডল ড. আম্বেদকরের সঙ্গে সরাসরি সাক্ষাৎ করতে পারেননি। বাবাসাহেবের ব্যস্ত কর্মসূচি ও শারীরিক অসুস্থতা সেই সুযোগকে বারবার ব্যাহত করেছিল। তাই তিনি আশা করেছিলেন, পাটনার এই সম্মেলনেই তাঁদের মধ্যে দীর্ঘ আলোচনা হবে এবং ভবিষ্যৎ কর্মপন্থা নির্ধারণে তিনি প্রয়োজনীয় দিকনির্দেশনা পাবেন।

উল্লেখ্য, দেশভাগের পর তফসিলি ফেডারেশনের কেন্দ্রীয় কার্যালয় ও সাংগঠনিক সম্পদ ঢাকায় স্থানান্তরিত হয়। সংগঠনের অধিকাংশ সমর্থকও পূর্ব পাকিস্তনের অন্তর্ভুক্ত অঞ্চলে থেকে যাওয়ায় স্বাধীনোত্তর পশ্চিমবঙ্গে ফেডারেশনের কার্যক্রম প্রায় বিলুপ্তির মুখে পড়ে। এই জটিল পরিস্থিতিতে সংগঠন পুনর্গঠন ও ভবিষ্যৎ কর্মসূচি নিয়ে ড. আম্বেদকরের সঙ্গে আলোচনা যোগেন্দ্রনাথের কাছে ছিল অত্যন্ত গুরুত্বপূর্ণ।

কিন্তু নিয়তি যেন অন্য কিছু লিখে রেখেছিল। হঠাৎ করেই ড. আম্বেদকরের শারীরিক অবস্থার অবনতি ঘটে। ফলে বহুদিনের প্রত্যাশিত সেই আলোচনা আর সম্ভব হয়নি। পাটনার কর্মসূচি সংক্ষিপ্ত করে যোগেন্দ্রনাথ দ্রুত দিল্লিতে পৌঁছান তাঁর প্রিয় নেতা ও আজীবন সংগ্রামের সহযোদ্ধার সঙ্গে দেখা করার জন্য।

দিল্লিতে গিয়ে ড. আম্বেদকরের শারীরিক অবস্থা দেখে তিনি গভীরভাবে মর্মাহত হন। তিনি উপলব্ধি করেছিলেন, সময় আর খুব বেশি নেই। আর সত্যিই, অল্প কয়েকদিনের মধ্যেই ১৯৫৬ সালের ৬ ডিসেম্বরের গভীর রাতে ঘুমের মধ্যেই চিরবিদায় নেন ভারতবর্ষের নিপীড়িত মানুষের মুক্তির অন্যতম শ্রেষ্ঠ কণ্ঠস্বর, বাবাসাহেব ড. ভীমরাও আম্বেদকর।

এই সংবাদে কান্নায় ভেঙ্গে পড়লেন মহাপ্রাণ যোগেন্দ্রনাথ - দিনের পর দিন কাটলো তাঁর বিনিদ্র রাত। কলকাতার ৬৪ নম্বর সুলতান আলম রোডে তাঁর অনুগামীরা তাঁকে সভাপতিত্বে রেখে একটি শোকসভার আয়োজন করেন। কিন্তু সেই সভায় শোকাহত যোগেন্দ্রনাথ মণ্ডল একটি শব্দও উচ্চারণ করতে পারেননি। তাঁর কণ্ঠরুদ্ধ হয়ে এসেছিল। প্রিয় নেতা, সংগ্রামের সহযাত্রী এবং নিপীড়িত মানুষের মুক্তির এক মহীরুহকে হারানোর বেদনা ভাষায় প্রকাশ করার শক্তি তাঁর ছিল না।

সুতরাং, ইতিহাসের প্রাপ্ত তথ্য থেকে স্পষ্ট যে, শেষ জীবনে যোগাযোগ বিচ্ছিন্ন ছিল—এমন সিদ্ধান্তে পৌঁছানো সঠিক নয়। বরং নানা প্রতিকূলতা সত্ত্বেও যোগেন্দ্রনাথ মণ্ডল ড. আম্বেদকরের সঙ্গে যোগাযোগ ও পরামর্শের চেষ্টা চালিয়ে গিয়েছিলেন। তাঁদের সম্পর্কের প্রকৃত মূল্যায়ন করতে হলে বিচ্ছিন্ন বিতর্ক নয়, বরং নিপীড়িত মানুষের অধিকার প্রতিষ্ঠার জন্য তাঁদের আজীবন সংগ্রাম ও যৌথ ঐতিহাসিক অবদানকে সামনে আনাই অধিকতর প্রয়োজন।

 

 





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Wednesday, 29 April 2026

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গুরুচাঁদ ঠাকুরের আলোয় মহাপ্রাণ যোগেন্দ্রনাথ মণ্ডল কর্তৃক শিক্ষা ও সমাজ সংস্কারের আন্দোলন। লেখক – জগদীশচন্দ্র রায়


 গুরুচাঁদ ঠাকুরের আলোয় মহাপ্রাণ যোগেন্দ্রনাথ মণ্ডল কর্তৃক

শিক্ষা ও সমাজ সংস্কারের আন্দোলন

লেখক – জগদীশচন্দ্র রায়

      গুরুচাঁদ ঠাকুরের বয়স পড়ন্ত বিকাল। তখন তিনি ৭০ বছরের বৃদ্ধ। আর তারই ভাব শিস্য যার বয়স মাত্র ২২ বছর। তখন ১৯২৬ সাল। যার শরীরে বইছে উন্মত্তো জোয়ারের ঢেউ। তখনকার দিনে চলছিল জমিদারের অত্যাচারবাহ্মণ্যবাদীদের ধর্মীয় ও সামাজিক শোষণ যার  পরিণতি স্বরূপ চরম দারিদ্র ও অশিক্ষা অন্ধকার হয়ে গ্রাস করে নিয়ে ছিল এই সবকিছুর বিরুদ্ধে প্রতিকারের জন্য যার মনের মধ্যে জ্বলছিল আগুন, তাঁর কন্ঠে ধ্বনিত হোল এই বয়সের ভারে ভারাক্রান্ত বৃদ্ধেরই বাণী। গুরুচাঁদ ঠাকুর যেমন বলেছিলেন,

খাও বা না খাও      তাতে দুঃখ নেই

চেলে মেয়েকে শিক্ষা দাও এই আমি চাই। (গুরুচাঁদ চরিত পৃ ১৪৪)

ছেলে মেয়েকে দিতে শিক্ষা

 প্রয়োজনে কর ভিক্ষা।

তিনি বুঝতে পেরিছিলেন অশিক্ষা হচ্ছে মারণ রোগ। তার জন্য তিনি বলেন,

অজ্ঞান ব্যাধিতে ভরা আছে এই দেশ।

জ্ঞানের আলোকে ব্যাধি তুমি কর শেষ।। -গুরুচাদ চরিত- পৃঃ ১৩৭

হ্যাতুমি যদি এই অজ্ঞানতার ব্যাধি থেকে মুক্ত হ’তে চাও তাহলে তুমি একমাত্র জ্ঞানের আলোদিয়েই এই ব্যাধি থেকে মুক্তি পাবে। আর তার জন্য তোমাকে বলি-

তাই বলিভাই       মুক্তি যদি চাই

     বিদ্যান হইতে হবে।

পেলে বিধ্যাধন       দুঃখ নিবারণ

     চির সুখি হবে ভবে।। (গুরুচাদ চরিত—ৃঃ ১৩০)

সেই উদিয়মান যুবক ঘোষণা করলেন –    

    “জমিদাররা চিরদিন প্রজাদের শোষণ করে বিসাল বৈভবের সোপান তোরী করে চলেছে। তাদের কাছে আবেদন নিবেদন করে কোনো লাভ হবে না। নিজেদের চেষ্টাতেই নিজেদের উন্নতির সোপান তৈরী করতে হবে। নিজেদের ক্ষুদ্র স্বার্থে নিমগ্ন না রেখে সমবেত প্রচেষ্টায়  সমাজের উন্নতি সাধন করতে হবে। স্বার্থত্যাগ ব্যতীত সমাজের কাজ হয় না। শিক্ষা হচ্ছে সমাজ উন্নয়নের চাবিকাঠি। নিরক্ষর  অশিক্ষিত সমাজকে কেউ মর্যাদা দেয় না। মর্যাদা মানুষকে নিজের  চেষ্টায় অর্জন করতে হয়। মর্যাদালাভের প্রথম সোপান হল শিক্ষালাভ। সমাজ থেকে নিরক্ষরতকে দূর করতে হবে। শিক্ষালাভ করলেই মানুষ সচেতন ও সংঘবদ্ধ হতে পারে। সংঘবদ্ধ মানুষকেই সকলে সমীহ করে থাকে ফলে সংঘবদ্ধ মানুষদের কেউ অত্যাচারনিপীড়ন ও শোষণ করতে  পারে না। প্রজারা খাদ্য বস্ত্র ও অন্যান্য সম্পদ তৈরি করে। কিন্তু জমিদারদের শোষণ ও অত্যাচারে তারা দরিদ্র ও নিঃশ্ব। শিক্ষালাভ করলে এবং সংঘবদ্ধ হলে আমরা জমিদারদের শোষণ ও অত্যাচার থেকে মুক্তিলাভ করব।” (তথ্য সূত্রঃ- ক্যুইজ অন- মহাপ্রাণ যোগেন্দ্রনাথপৃ ৪/৫)

   ১৯৩৭ সালের ৭ ফেবরুয়ারী বাখরগঞ্জ উত্তর-পূর্ব নির্বাচন কেন্দ্র থেকে স্বনামধন্য আইনজীবি ও জমিদার অশ্বিনীকুমার দত্তের ভ্রাতুস্পুত্র কংগ্রেসের প্রার্থী সরল দত্তকে যোগেন্দ্রনাথ মণ্ডল (১২০৬৯-১০৬১৩=) ১৮১৬ ভোটের ব্যবধানে বিজয়ী হয়ে আগৈলঝাড়া ভেগাই হালদার পাবলিক একাডেমীকে হাইস্কুলে পরিণত করেন এবং তিনি এই বিদ্যালয়ের সম্পাদকের দায়িত্ব গ্রহণ করেন। (তথ্য সূত্রঃ- ক্যুইজ অন- মহাপ্রাণ যোগেন্দ্রনাথপৃ ৯/১০)

   পুলিশ বিভাগে তপশিলি  পুলিশদের জন্য আলাদা কোয়াটার্‌স -এর ব্যবস্থা করেন। কারণ তখকার দিনে তপশিলি পুলিশদের সাধারণ কোয়াটার্‌স-এ বসে থাকতে দেওয়া হত না। যোগেন্দ্রনাথ স্বরাষ্ট্র মন্ত্রী খাজা নাজিমউদ্দীন সাহেবকে ধরে তপশিলি পুলিশদের জন্য সাধারণ ব্যারাকের একটি অংশ বরাদ্দ করেন।

    এই সময় গ্রাম অঞ্চলে জল নিকাশের কোনো ব্যবস্থা ছিল না। ফলে চাষীদের যথেষ্ট ক্ষয় ক্ষতির সম্মুখীন হতে হত। তাঁর চেষ্টায় গ্রামাঞ্চলে অনেক বাঁধ তৈরিখাল খনন এবং রাস্তা নির্মাণ করা হয়।  

   তপশিলি জাতির ছাত্রদের কলকাতা শহরে থেকে পড়াশুনা করার কোনো ব্যবস্থা ছিল না। সে জন্য তপশিলিদের জন্য তিনি দুটি ছাত্রাবাসের দাবি করেন। মুসলিম লীগের সর্থনে তপশিলি ও মুসলমান্দের জন্য দুটি করে ছাত্রাবাস নির্মাণের প্রস্তাব অনুমোদন লাভ করে।

    তৎকালীন অর্থমন্ত্রী নলিনী রঞ্জন সরকারকে যোগেন্দ্রনাথ বলেন প্রতিটি কলেজ হোস্টেলে কিছু সংখ্যক আসন তপশিলি ছাত্রদের জন্য সংরক্ষিত করলেদরিদ্র ছাত্রদের সিটরেন্ট ফ্রি করে এবং তাদের ভরণপোষণের জন্য মাসে ১৫ টাকা অনুদানের ব্যবস্থা করা হলে সাধারণ ছাত্রাবাস থেকে তপশিলি ছাত্রদের পড়াশুনা করতে কোনো অসুবিধা হবে না। অর্থমন্ত্রী যোগেন্দ্রনাথের প্রস্তাব পুরোপুরি মেনে নিলেন। তপশিলি শ্রেণির ছাত্ররা আজ পর্যন্ত পড়াশুনার ক্ষেত্রে যেসব সুযোগ সুবিধা পেয়েছে তার সূত্রপাত যোগেন্দ্রনাথ করেছিলেন।

    তপশিলি ছাত্রদের ৭ম শ্রেণির পরিবর্তে ৪র্থ শ্রেণি থেকে বৃত্তি প্রদানমফঃস্বল শহরের ছাত্রাবাসগুলিতে আসল সংরক্ষণ এবং উক্ত ছাত্রদের জন্য সরকারী ব্যবস্থা করা এম এল সি হিসাবে যোগেন্দ্রনাথের উল্লেখযোগ্য কাজ। (তথ্য সূত্রঃ- ক্যুইজ অন- মহাপ্রাণ যোগেন্দ্রনাথপৃ ৯/১০)  

    এ কে ফজলুল হকের নেতৃত্বে গণতন্ত্রের আদর্শ অনুযায়ী কংগ্রেসহিন্দু মহাসভা ও তপশিলি বিধায়কদের নিয়ে মন্ত্রিসভা গঠিত হলে এই মন্ত্রীসভায় যোগেন্দ্রনাথ কৃষকদের স্বার্থে জমিদারী প্রথা উচ্ছেদ করে কৃষকদের মধ্যে জমি বিলির ব্যবস্থা করেন। (তথ্য সূত্রঃ- ক্যুইজ অন- মহাপ্রাণ যোগেন্দ্রনাথপৃ ১০/১১)

     এই সময় প্রাথমিক বিদ্যালয়ের শিক্ষকদের পদগুলি অস্থায়ী ছিল এবং তাঁরা নিয়মিত মাসিক বেতন পেতেন না। যোগেন্দ্রনাথ শিক্ষকদের পদগুলি স্থায়ীকরণের ব্যবস্থা করেন। (তথ্য সূত্রঃ- ক্যুইজ অন- মহাপ্রাণ যোগেন্দ্রনাথপৃ ১১)

     ১৯৩৯ সালে কলকাতা কর্পোরেশনে মুসলমান ও তপশিলিদের জন্য আসন সংরক্ষণ ও পৃথক নির্বাচনের জন্য বিল আনা হয়। যোগেন্দ্রনাথ তপশিলি প্রার্থীদের জন্য শতকরা ৫টি করে আসন সংরক্ষিত করেন। এ কাজে তাঁকে কংগ্রেসের সিদ্ধান্তের বিরোধিতা করতে হয়েছিল। (তথ্য সূত্রঃ- ক্যুইজ অন- মহাপ্রাণ যোগেন্দ্রনাথপৃ ১১/১২)

    ১৯৪৩ সালে যোগেন্দ্রনাথ নাজিমুদ্দিন মন্ত্রীসভায় যোগদানের শর্ত স্বরূপ তপশিলিদের জন্য দাবি আদায় করেন-

১) তপশিলিদের ৩ জন্য মন্ত্রী ও ৩ জন্য পার্লামেন্টারী সেক্রেটারী নিয়োগ করতে হবে।

২) তপশিলি ছাত্রদের শিক্ষার জন্য বার্ষিক ৫ লক্ষ টাকার রেকারিং গ্রান্ট মঞ্জুর করতে হবে।

৩) সাম্প্রদায়িক অনুপাত অনুসারে সকল সরকারী চাকুরীতে তপশিলি প্রার্থীদের নিয়োগ করতে হবে। ‘গেজেটেড পোস্টেও সংরক্ষণ’ নীতি মানতে হবে। তপশিলি এম এস সি-রা সিদ্ধান্ত গ্রহণ করলেন যেউক্ত দাবি সমূহ যিনি মেনে নেবেন তাঁকেই নেতা হিসাবে সমর্থন করবেন। (তথ্য সূত্রঃ- ক্যুইজ অন- মহাপ্রাণ যোগেন্দ্রনাথপৃ ১৪)

    খাজা নাজিমুদ্দিনের আমলে তপশিলিদের জন্য সরকারী চাকরীতে সংরক্ষিত কোটা থাকলেও কিছু কিছু বিভাগ থেকে অভিযোগ আসছিল যেএই কোটা সঠিকভাবে দেওয়া হচ্ছে না। তখন যোগেন্দ্রনাথ মণ্ডল মন্ত্রীসভার মিটিং-এ এই ঘটনার উল্লেখ করেনএবং এটাও বলেন, যদি অন্যান্য বিভাগে তপশিলিদের কোটা পুরণ করা না হয়তবে আমার বিভাগের একটি চাকরিও মুসলমান অথবা বর্ণ হিন্দুকে দেবো না। সমস্ত চাকরি তপশিলি জাতির প্রার্থীগণকে দিয়ে অন্য বিভাগের ক্ষতি পূরণ করব।।” তপশিলি ছাড়া অন্য কাউকেই চাকরীতে নিয়োগ করব না।”

      এরূপ মন্তব্যে হামিদুল হক চৌধুরীসহ লিগের প্রভাবশালী সদস্যগণ ক্রুদ্ধ স্বরে যোগেন্দ্রনাথের বিরুদ্ধে বাক্য প্রয়োগ করতে থাকেন। তখন যোগেন্দ্রনাথও অনুরূপ ক্রুদ্ধ কণ্ঠে বলেন-“মিঃ হামিদুল হক চৌধুরীলালচোখ দেখাবেন না। লালচক্ষু আমাদেরও আছে। আমি মন্ত্রীত্ব করিচাকরি নয়এই মন্ত্রী কারো দেওয়া দান নয়। যে সুখের ঘর বেঁধে দিয়েছিপ্রয়োজন হলে চব্বিশ ঘন্টার মধ্যে সেটা ভেঙ্গে দিতে পারি।” এই মন্তব্য শুনে খাজা নাজিমুদ্দিন তাঁকে আশ্বাস দিলেন যেসমস্ত দপ্তরে যাতে সংরক্ষিত কোটা পূরণ হয় তা তিনি অবশ্যই দেখবেন। (তথ্য- মহাপ্রাণ যোগেন্দ্রনাথ ১ম খণ্ডলেখক- জগদীশ্চন্দ্র মণ্ডলপৃষ্ঠা ১১০)।

    যোগেন্দ্রনাথের মন্ত্রীত্বকাল কলকাতা মেডিকেল কলেজ ও ক্যাম্বেল মেডিকেল স্কুলে সংরক্ষণ প্রথা চালু হয়। তাঁর তত্ত্বাবধানে প্রচুত তপশিলি ছাত্র-ছাত্রী মেডিকেন কেলেজে ও মেডিকেল স্কুলে ভর্তি হয়ে পরবর্তিকালে চিকিৎসক সিসাবে জীবনে সুপ্রতিষ্ঠিত হতে পেরেছিলেন। (তথ্য সূত্রঃ- ক্যুইজ অন- মহাপ্রাণ যোগেন্দ্রনাথপৃ ১৬)

    যোগেন্দ্রনাথের উদ্যোগে কলকাতা শহরে কলেজ ও উচ্চশিক্ষা ক্ষেত্রে পাঠরত তপশিলি ছাত্রদের জন্য উদয়ন ছাত্রাবাস’ এবং ওয়েলিংটন স্ট্রীটে ভারতী ভবন’ ৭৬ নং চিত্তরঞ্জন এভিনিউতে প্রতিষ্ঠিত হয়।

  নাজিমুদ্দিন মন্ত্রীসভা গঠিত হবার পর একদিন মন্ত্রীমণ্ডলীর সভায় একজন মন্ত্রী কলকাতায় মুসলিম ছাত্রদের দজন্য দুটি হোস্টেল করার প্রস্তাব তোলেন। সঙ্গে সঙ্গে যোগেন্দ্রনাথও প্রস্তাব তোলেন যে তপশিলি ছাত্রদের কলকাতা শহরে লজিং বা থাকার মত জায়গা পাবার সুযোগ নেই। উচ্চবর্ণের হিন্দুরা তপশিলিদের ঘর ভাড়া দেয় না। (সেই সময় দেওয়া হতো না)। যোগেন্দ্রনাথের এই প্রস্তাবকে কেউই অস্বীকার করতে পারলেন না। ফলে একই সঙ্গে মন্ত্রীসভায় প্রস্থাব গৃহীত হল যেমুসলিম ছাত্রদের জন্য ২টি এবং তপশিলি ছাত্রদের জন্য ২টি হোস্টেল স্থাপন করা হবে। (তথ্য সূত্রঃ- ক্যুইজ অন- মহাপ্রাণ যোগেন্দ্রনাথপৃ ১৭)  

নারী শিক্ষার জন্য গুরুচাঁদ ঠাকুর যেমন বলেছেন-

শুনেছি পিতার কাছে আমি বহুবার।

নারী ও পুরুষ পাবে সম অধিকার।।

সমাজে পুরুষ পাবে যে অধিকার।

নারীও বাইবে তাহা করিলে বিচার।।

তাই তাঁর উদ্যোগে ১৯৩২ সালে ওড়াকান্দীতে হরি-গুরুচাদ মিশন’ প্রতিষ্ঠা করে সেই মিশিনের সহায়তায় ওড়াকান্দীর তালতলায় নারী শিক্ষার জন্য স্কুল প্রতিষ্ঠা করেন। আবার 

নারী শিক্ষা তরে প্রভু আপন আলয়।

শান্তি-সত্যভামা’ নামে স্কুল গড়ে দেয়।।”(গুরুচাঁদ চরিত পৃ ৫৪৬)

অর্থাৎ শান্তি সত্যভামা’ (শান্তি গুরুচাঁদ ঠাকুরের মাআর সত্যভামা গুরুচাঁদ ঠাকুরের জীবনসঙ্গিনী) –এর নামে একটা আলাদা নারীদের জন্য স্কুল তৈরি করেন। তিনি ঘোষণা করেন-

বালক বালিকা দোঁহে(দুজনেপাঠশালে দাও।

লোকে বলে মার গুণে ভালো হয় ছাও(সন্তান)” (গুরুচাঁদ চরিত পৃ ৫২৯)

                 নারী শিক্ষার ক্ষেত্রে যোগেন্দ্রনাথে অবদান-

    ১৯৪৪ সালে নারী শিক্ষার উপর যোগেন্দ্রনাথ জোর দিয়ে বলেনপুরুষেরা বেশিরভাগ সময় কাজ কর্মে গৃহের বাইরে থাকে। সেজন্য তারা সন্তানদের পড়াশুনার দিকে লক্ষ্য দিতে পারে না। সেজন্য নারী শিক্ষার একান্ত প্রয়োজন। (তথ্য সূত্রঃ- ক্যুইজ অন- মহাপ্রাণ যোগেন্দ্রনাথপৃ ১৮/১৯)

    তিনি তৎকালীন শিক্ষামন্ত্রী নাজিমুদ্দিন খানের নিকল অবৈতনিক প্রাথমিক বালিকা বিদ্যালয় স্থাপন করার প্রস্তাব দিয়েছিলেন। বিধান পরিষদে বিপুল ভোটে উক্ত বিলটি পাশ হয়।

    যোগেন্দ্রনাথে চেষ্টার ফলে নাজিমুদ্দিন সাহেবের মন্ত্রীসভায় তপশিলি ছাত্র-ছাত্রীদের শিক্ষার জন্য ৮ম শ্রেণির পরিবর্তে ৪র্থ শ্রেণি থেকেই অনুদানের ব্যবস্থা করা হয়েছিল।

    নিরক্ষরতা দূরীকরণের পরিকল্পনায় যোগেন্দ্রনাথের বিশেষ গুরুত্বপূর্ণ ভূমিকা ছিল। ভারত দরিদ্র দেশসেজন্য সরকারী অর্থ যাতে সাশ্রয় করা যায় সেদিকে তিনি লক্ষ্য দিলেন। তিনি ছাত্র সমাজকে প্রত্যেক বাড়ি বাড়ি গিয়ে প্রাথমিক শিক্ষা দেবার ব্যবস্থা করেন। এই সময় ছাত্র সমাজে এক নবী উৎসাহের সঞ্চার হয়েছিল। (তথ্য সূত্রঃ- ক্যুইজ অন- মহাপ্রাণ যোগেন্দ্রনাথপৃ ১৯)

    ১৯৪৪ সালে যোগেন্দ্রনাথের নেতৃত্বে বরিশালে সন্তোষকুমারী তালুকদারের নেতৃত্বে একটি মহিলা সভা অনুষ্ঠিত হয়। সেই সভায় যোগেন্দ্রনাথ বলেছিলেন, মায়েরাই শিশুদের প্রথম শিক্ষায়ীত্রী। তাই তপশিলি সমাজাকে শিক্ষিত করতে হলে নারী সমাজকে আগে শিক্ষাদান করা দরকার। প্রতিটি পরিবারের মেয়েদের স্কুলে পাঠাতে হবে। (তথ্য সূত্রঃ- ক্যুইজ অন- মহাপ্রাণ যোগেন্দ্রনাথপৃ ২২)

    যোগেন্দ্রনাথ মণ্ডলের মন্ত্রীত্বকালে তপশিলি ছাত্ররা সরকারী বৃত্তি লাভ করে বিদেশে উচ্চশিক্ষা লাভের সুযোগ পেয়েছিল। এইসব ছাত্রদের মধ্যে একজন ছিল গোপালগঞ্জের কুমুদবন্ধু মজুমদার। তিনি আমিরিকার কলম্বিয়া বিশ্ববিদ্যালয়ে শিক্ষা বিষয়ে উচ্চশিক্ষা লাগের সুযোগ পান। আমেরিকা যাওয়ার জন্য তাঁর কিছু অর্থের অভাব ঘটে। তিনি তখন যোগেন্দ্রনাথের কাছে সাহায্য চান। তিনি বলেন ফিরে এসে চাকরি পাওয়ার পর এই টাকা পরিশোধ করবেন। যোগেন্দ্রনাথ তাঁকে ৭৫০ টাকার একটি চেক লিখে দেন।

    কুমুদবন্ধু উচ্চশিক্ষা লাভ করে ফিরে এসে বাংলার সরকারের শিক্ষা দপ্তরে উচ্চপদে চাকরি করেন। কিন্তু যোগেন্দ্রনাথের ঋণ পরিশোধের কথা কখনো মনে করেননি।

    পরবর্তীকালে যোগেন্দ্রনাথ আর্থিক অনটনে যখন কাল কাটাচ্ছিলেনতখন তিনি কুমুদবাবুকে তাঁর ঋণের কথা স্মরণ করিয়ে দেন এবং মাসে অন্ততঃ ৫০ টাকা করে পরিষোধ করার প্রস্তাব দিয়ে পত্র দেন। কিন্তু কুমুদবাবু সেই পত্রের জবাব দেওয়ার মতো সৌজন্যবোধটুকুও দেখাননি। এই ধরনের নেমকহারাম ব্যক্তির সংখ্যা তপশিলি সমাজে নিতান্ত কম নয়। (তথ্য সূত্রঃ- ক্যুইজ অন- মহাপ্রাণ যোগেন্দ্রনাথপৃ ২২)

 

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