महाप्राण
योगेन्द्रनाथ मंडल के योगदान को नकारकर उन्हें बदनाम करने का कारण क्या है? उनके विरुद्ध किए जा रहे दुष्प्रचार के जवाब में
यह रिपोर्ट।
लेखक — जगदीशचन्द्र राय
योगेन्द्रनाथ
मंडल का नाम सुनते ही एक वर्ग के लोग उन्हें गाली देना शुरू कर देते हैं। उनके
अनुसार, योगेन मंडल
ने बंगाल का विभाजन किया। इसके कारण पूर्वी बंगाल के हिंदुओं को अत्यंत कठिन
परिस्थितियों का सामना करना पड़ा। योगेन मंडल ने अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए
मंत्री पद के लालच में पाकिस्तान में मंत्री पद स्वीकार किया। उन्होंने मुस्लिम
लीग की मंत्रिमंडल में शामिल होना क्यों स्वीकार किया? पाकिस्तान से वे क्यों भागकर भारत आए?
ऐसे हजारों
प्रश्न हैं। हमने इन सभी प्रश्नों को ध्यान में रखते हुए तथ्यों के साथ उत्तर देने
का प्रयास अपनी पुस्तक “इतिहास के परिप्रेक्ष्य में महाप्राण
योगेन्द्रनाथ” में किया है। यद्यपि किसी की
टेढ़ी पूँछ पर कितना भी तेल क्यों न लगाया जाए, वह सीधी नहीं होगी। लेकिन जिन लोगों के पास थोड़ा-सा भी सोचने-विचारने का
अवसर और विवेक है, वे शायद कुछ विचार कर सकेंगे।
योगेन्द्रनाथ
मंडल बंगाल के ‘आंबेडकर’ हैं। वे
वंचित और पिछड़े वर्गों के लोगों के लिए ‘महाप्राण’ हैं। उनके नेतृत्व में बाबासाहेब को संविधान सभा
में भेजने में सफलता मिली थी। संवैधानिक सुविधाओं के कारण वंचित वर्गों के लोगों
का काफी हद तक उत्थान हुआ है। इसी कारण जातिवादियों में इतनी बेचैनी
है। इसलिए वे आरक्षण को समाप्त करने के खेल में लगे हुए हैं। इस कार्य में कुछ मीर जाफर भी उनका साथ देने के लिए मिल गए हैं।
महाप्राण के
बारे में उनके योग्य पुत्र जगदीशचन्द्र मंडल ने “महाप्राण योगेन्द्रनाथ” नाम से सात खंडों में पुस्तक प्रकाशित की है, जिसमें अनेक तथ्य प्रस्तुत किए गए हैं। इसलिए उन्होंने स्वयं को लेखक के
रूप में दावा नहीं किया है। क्योंकि उन्होंने तत्कालीन समाचार-पत्रों, पत्र-पत्रिकाओं तथा अन्य स्रोतों से तथ्य एकत्र
करके इन पुस्तकों का प्रकाशन किया है।
नागपुर विश्वविद्यालय
के प्रोफेसर प्रदीप आगलावे ने कहा है, “यदि बाबासाहेब संविधान सभा में नहीं जा
पाते, तो
इस देश का संविधान ब्राह्मणों के पक्ष में ही लिखा जाता। इसलिए योगेंद्रनाथ मंडल
ने आंबेडकरी आंदोलन में जो सहयोग किया और मूलनिवासियों के उद्धार के लिए जो कार्य
किया, वह
असाधारण कार्य है।”
(स्रोत— ‘सांवैधानिक
भारत निर्माता बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर और महाप्राण योगेंद्रनाथ मंडल’, लेखक— डॉ. संजय गजभिए, पृष्ठ 11)
**जापानी शोधकर्ता मासायुकि उसुदा ने
योगेंद्रनाथ मंडल के कार्यजीवन की तुलना डॉ. आंबेडकर के कार्यजीवन से करते हुए इस
बात पर दुःख व्यक्त किया है कि भारतीय इतिहास के एक महत्वपूर्ण युग-संधिकाल के इस
विशिष्ट राजनीतिक व्यक्तित्व की जिस प्रकार उपेक्षा की गई, वह अत्यंत खेदजनक है।**⁵⁶ (स्रोत— ‘महाप्राण योगेंद्रनाथ : बंगभंग और अन्य प्रसंग’,
लेखक— सदानंद विश्वास,
पृष्ठ 234)
⁵⁶ Pushed Towards the Partition:
Jogendranath Mandal and the Constrained Namasudra Movement — Masayuki Usuda /
Caste System, Untouchability and the Depressed — H. Katani (Ed.), pp. 221.
बंगाल में
तो महाप्राण योगेंद्रनाथ मंडल के प्रति बदनामी का पहाड़ खड़ा किया जा रहा है।
हिंदी भाषी क्षेत्रों में भी पुस्तकों के लेखन और वक्तव्यों के माध्यम से यह
बदनामी तथा उनके योगदान का श्रेय किसी और को देने का कार्य चल रहा है। यह जानबूझकर
किया जा रहा हो सकता है या फिर संबंधित लोगों को सही तथ्यों की जानकारी के अभाव के
कारण भी ऐसा हो सकता है। आइए, इस विषय पर
चर्चा करें।
यह कहा जाता है कि—
१) योगेंद्रनाथ मंडल के नेतृत्व में बाबासाहेब को
पूर्वी बंगाल (बंगाल) से संविधान सभा के लिए निर्वाचित कर भेजा गया था।
२) बंगाल के नमःशूद्र लोगों ने बाबासाहेब को
संविधान सभा में निर्वाचित करके भेजा था।
३) एक बड़े संगठन के अध्यक्ष ने कहा है कि
योगेंद्रनाथ मंडल को पाकिस्तान जाने से मना किया गया था।
४) लेखक शंकरानंद शास्त्री ने अपनी पुस्तक में लिखा
है कि भारत के विभाजन के बाद, कराची जाने से पहले योगेंद्रनाथ मंडल ने बाबासाहेब को एक ‘तार’ (टेलीग्राम) भेजा था। लेकिन बाबासाहेब ने मंडल के उस तार का
कोई उत्तर नहीं दिया।
५) DR. AMBEDKAR: LIFE AND MISSION के लेखक धनंजय कीर ने पृष्ठ 382 पर लिखा है—
“There with
the backing of Muslim League, he was elected to the Constituent Assembly.”
अर्थात्— “वहाँ
मुस्लिम लीग के समर्थन से वे संविधान सभा के लिए निर्वाचित हुए थे।”
आइए, एक-एक करके इन झूठे आरोपों का जवाब
प्रस्तुत करते हैं—
१)
“योगेंद्रनाथ मंडल के नेतृत्व में बाबासाहेब को पूर्वी बंगाल (बंगाल) से संविधान
सभा के लिए निर्वाचित करके भेजा गया था।”
हमें इस विषय में थोड़ा अध्ययन करना
चाहिए। जिस स्थान को आज पूर्वी बंगाल (बांग्ला) कहा जा रहा है,
वह 1947
तक भारत का ही हिस्सा
था, और आज वही क्षेत्र बांग्लादेश है। 1971 तक यह क्षेत्र पूर्वी पाकिस्तान
था।
यदि हम कहना चाहें, तो इसे ‘पूर्वी बंगाल’ कह सकते हैं। क्योंकि
जिस क्षेत्र से—जेसोर,
खुलना, बरिशाल और फरीदपुर—के लोगों ने बाबासाहेब को निर्वाचित
करके संविधान सभा में भेजा था, वह
पश्चिम बंगाल नहीं था; उस
समय वह पूर्वी बंगाल अथवा भारत का ही हिस्सा था।
एक छोटी-सी बात में भी बहुत बड़ा अंतर
होता है। मैं यह बात किसी की आलोचना करने के उद्देश्य से नहीं कह रहा हूँ। मेरा
मानना है कि आप लोगों को इसे ठीक कर लेना चाहिए। क्योंकि यदि हम सही
बात नहीं कहेंगे, तो
आने वाले समय में हमारी ही समस्याएँ और बढ़ेंगी।
आरोप
– २) “बंगाल के नमःशूद्र लोगों ने बाबासाहेब को संविधान सभा में निर्वाचित करके
भेजा था।”
“बंगाल के नमःशूद्र लोगों ने बाबासाहेब
को संविधान सभा में भेजा था”—इस बात में भी थोड़ी त्रुटि है। बाबासाहेब आंबेडकर को
जो सात
वोट मिले
थे, उनमें केवल नमःशूद्र ही नहीं थे; उनमें राजवंशी लोग भी शामिल थे। इसके अलावा एक आदिवासी/मूलनिवासी प्रतिनिधि भी थे।
जिन लोगों ने संघर्ष किया था, वे अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST)
समुदायों के लोग थे। लेकिन यदि आप केवल नमःशूद्र लोगों का उल्लेख करते
हैं, तो यह अन्य समुदायों
के साथ न्याय नहीं होगा।
आप यह कह सकते हैं कि SC और ST समुदाय के लोगों ने बाबासाहेब को
निर्वाचित करके संविधान सभा में भेजा था। मैं केवल इस कथन को सही करने के
उद्देश्य से यह बात कह रहा हूँ।
आरोप – ३) एक बड़े संगठन के
अध्यक्ष ने कहा है— “योगेंद्रनाथ मंडल को पाकिस्तान जाने से मना किया गया था।”
हमारे ही एक
बड़े संगठन के अध्यक्ष हैं। उन्होंने एक वीडियो में क्या कहा? उन्होंने कहा— “नहीं, बाबासाहेब आंबेडकर ने योगेंद्रनाथ मंडल को
पाकिस्तान जाने से मना किया था। लेकिन उन्होंने बाबासाहेब की बात नहीं मानी।”
आइए, इस विषय पर विस्तृत जानकारी के साथ चर्चा करते
हैं—
लेकिन आपको एक महत्वपूर्ण
तथ्य बताना चाहता हूँ।
30 मई 1947 को बाबासाहेब आंबेडकर को योगेंद्रनाथ मंडल ने एक पत्र लिखा था— “इस
परिस्थिति में मैं क्या करूँ?” क्योंकि बहुत जल्द देश का विभाजन और बंगाल का
विभाजन हो सकता था। वे
बाबासाहेब को अपना राजनीतिक गुरु मानते थे। इसलिए इस कठिन परिस्थिति में ‘गुरु’ से
समस्या का समाधान जानने के लिए उन्होंने यह पत्र लिखा था।
यहाँ ‘गुरु’ शब्द का अर्थ आज के समय में प्रचलित गुरु के
अर्थ में नहीं है; यहाँ ‘गुरु’ से आशय श्रद्धेय या सम्मानित व्यक्ति से है।
योगेंद्रनाथ
मंडल का वह पत्र प्राप्त होने के बाद 2 जून 1947 को बाबासाहेब ने योगेंद्रनाथ मंडल को एक पत्र भेजा। उस पत्र में उन्होंने योगेंद्रनाथ मंडल को क्या करना चाहिए, इस विषय पर अपना परामर्श दिया था।
मैं उस पत्र
की कुछ पंक्तियाँ आप लोगों के सामने प्रस्तुत कर रहा हूँ। पूरा पत्र पुस्तक के परिशिष्ट में दिया गया है।
***The Scheduled Castes were incapable of doing anything precisely with
regard to the question of partition. They could neithr force partition nor could they
prevent partition if it was coming. The only course left to the Scheduled
Castes is to fight for safeguards either in United Bengal or a devided Bengal.
---I have of
course told the Hindus that in case here is partition they shall have to agree
to reserve some land in Western Bengal for the Scheduled Castes of Eastern
Bengal.
--- I agree that you should work in alliance with the League and secure
adequate safeguards for them,
-- The Muslim League however, will be ready to give to the Scheduled
Castes separate electorates more probably because they themselves want separate
electorates for their own community.
-- In my view that Memorandum contains all that we need for our
protection, not only in Eastern Bengal but in every province in India. I think
you should make this memorandum the best use in your negotiations with Muslim
League. Of course, you are free to add to it any new safeguards for our people
in Eastern Bengal which you think there are some special circumstances which
call for such safeguards. -
हिंदी अनुवाद:
“विभाजन के प्रश्न पर अनुसूचित जातियों के पक्ष में विशेष रूप से कुछ करने
की क्षमता नहीं थी। वे न तो विभाजन कराने के लिए बाध्य कर सकते थे और न ही, यदि विभाजन अपरिहार्य हो जाए, तो उसे रोक सकते थे। अनुसूचित जातियों के सामने
एकमात्र रास्ता यही था कि बंगाल अखंड रहे या विभाजित हो—दोनों ही परिस्थितियों में
अपने अधिकारों और सुरक्षा के लिए सुरक्षा-व्यवस्थाओं की माँग को लेकर संघर्ष किया
जाए।”
“मैंने हिंदुओं से अवश्य कह दिया है कि यदि विभाजन होता है, तो उन्हें पूर्वी बंगाल के अनुसूचित जाति के
लोगों के लिए पश्चिम बंगाल में कुछ भूमि आरक्षित करने पर सहमत होना होगा।”
“मैं इस बात से सहमत हूँ कि आपको मुस्लिम लीग के साथ गठबंधन करके काम करना
चाहिए और उनके लिए पर्याप्त सुरक्षा-व्यवस्था सुनिश्चित करनी चाहिए।”
“हालाँकि, मुस्लिम लीग
अनुसूचित जातियों के लिए पृथक निर्वाचक मंडल (Separate Electorates) देने के लिए तैयार
रहेगी—संभवतः इसलिए कि वे भी अपने समुदाय के लिए पृथक निर्वाचक मंडल चाहते हैं।”
“मेरे विचार से, उस ज्ञापन में हमारी सुरक्षा के लिए आवश्यक सभी बातें शामिल हैं—केवल
पूर्वी बंगाल के लिए ही नहीं, बल्कि भारत के प्रत्येक प्रांत के लिए। मेरा मानना है कि मुस्लिम लीग के
साथ आपकी बातचीत में इस ज्ञापन का सर्वोत्तम ढंग से उपयोग किया जाना चाहिए। बेशक, यदि आपको लगता है कि पूर्वी बंगाल में हमारे
लोगों के लिए ऐसी किसी नई सुरक्षा-व्यवस्था की आवश्यकता है, जो वहाँ की विशेष परिस्थितियों के कारण आवश्यक
हो, तो आप उसमें
उन बातों को भी जोड़ सकते हैं।”
इसके बाद शंकरानंद शास्त्री ने लिखा है—
“बाबासाहेब ने श्री मंडल के तार का कोई
उत्तर नहीं दिया। वे मौन रहे। उस समय लेखक तिलक मार्ग, नई दिल्ली में बाबासाहेब के साथ ही रह
रहे थे। उस समय बाबासाहेब ने अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा था—
‘श्री मंडल को मुस्लिम लीग की मंत्रिमंडल
में शामिल नहीं होना चाहिए था। मुस्लिम राजनीति ऐसी ही है कि वे कभी भी किसी अन्य
के साथ मिलकर किसी अत्याचार का सामना नहीं कर सकते।’”
लेखक ने क्या कहा है—“बाबासाहेब ने श्री
मंडल के तार का कोई उत्तर नहीं दिया।”
लेकिन हम देख रहे हैं कि बाबासाहेब ने
योगेंद्रनाथ मंडल के 30 मई 1947 के पत्र का उत्तर 2 जून 1947 को दिया था। और उस पत्र में क्या लिखा
था, उसका
थोड़ा-सा अंश मैंने ऊपर प्रस्तुत किया है।
इसके बाद शंकरानंद शास्त्री ने लिखा है—
“श्री मंडल का क्या परिणाम होगा? अभी कुछ कहना संभव नहीं है। फिर भी,
क्या वे पाकिस्तान
में हमारे लोगों को मुसलमान बनने से रोक पाएँगे? पाकिस्तान में जो अस्पृश्य रहेंगे,
क्या वे अस्पृश्य के
रूप में मानवीय अधिकार प्राप्त कर पाएँगे? क्या वे पाकिस्तान में टिक पाएँगे?—ये कुछ ऐसे प्रश्न हैं, जिनका उत्तर समय ही देगा।”
योगेंद्रनाथ मंडल को इस परिस्थिति में
क्या करना चाहिए, इस
विषय में बाबासाहेब ने अपने पत्र में विस्तार से लिखा था। इसके बावजूद योगेंद्रनाथ
मंडल को लेकर इस प्रकार का गलत प्रचार क्यों किया जा रहा है?
अब आते हैं सबसे अपमानजनक टिप्पणी पर—
५) DR. AMBEDKAR:
LIFE AND MISSION — लेखक धनंजय कीर, पृष्ठ संख्या 382 पर लिखा है—
“There with the backing of Muslim League,
he was elected to the Constituent Assembly.”
बाबासाहेब
के जीवनीकार धनंजय कीर ने अपनी पुस्तक ‘डॉ. आंबेडकर: जीवन और मिशन’ के
पृष्ठ संख्या 382 पर
उल्लेख किया है—
“Ambedkar had no men in the Bombay
Assembly to support his candidature, and so his name was put up through the
Scheduled Castes representatives in the Bengal Assembly. There with the backing
of Muslim League, he was elected to the Constituent Assembly.”
अर्थात्,
आंबेडकर की
उम्मीदवारी का समर्थन करने के लिए बॉम्बे विधानसभा में उनके पास कोई
व्यक्ति/प्रतिनिधि नहीं था। इसलिए बंगाल विधानसभा में मौजूद अनुसूचित जाति के
प्रतिनिधियों के माध्यम से उनका नाम प्रस्तावित किया गया। वहाँ मुस्लिम लीग के
समर्थन से वे संविधान सभा (Constituent Assembly) के लिए निर्वाचित हुए।
क्या आप जानते हैं, इसका असली कारण क्या था?
उस समय जो चुनाव हुआ था, उसमें हिंदू केवल हिंदू उम्मीदवारों को ही वोट
दे सकते थे। इसी प्रकार, मुसलमान केवल मुस्लिम उम्मीदवारों को ही
वोट दे सकते थे। एंग्लो-इंडियन किसी भी उम्मीदवार को
वोट दे सकते थे। लेकिन उस चुनाव में एंग्लो-इंडियनों ने भाग नहीं लिया। बाबासाहेब
को उम्मीद थी कि शायद वे उन्हें वोट देंगे; लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
इसलिए बाबासाहेब को संविधान सभा में
भेजने के लिए जहाँ न्यूनतम पाँच वोटों की आवश्यकता थी,
वहाँ उन्हें सात वोट मिले। इसके पीछे एक लंबा इतिहास है। मैं
इस समय उसके बारे में अधिक विस्तार से चर्चा नहीं कर रहा हूँ।
उस समय वहाँ मुस्लिम लीग की मंत्रिमंडल थी और उस मंत्रिमंडल
में योगेंद्रनाथ
मंडल भी मंत्री थे। वहाँ योगेंद्रनाथ मंडल मुस्लिम लीग के
साथ मिलकर काम कर रहे थे।
लेकिन वोट देने के समय मुसलमानों को बाबासाहेब
को वोट देने का अधिकार नहीं था। उन्होंने उन्हें नैतिक समर्थन दिया था। किस प्रकार
मुसलमानों ने बाबासाहेब को परोक्ष रूप से अपनी क्षमता के अनुसार समर्थन दिया था,
उसके कुछ उदाहरण मैं आपके सामने
प्रस्तुत कर रहा हूँ—
१) टांगाइल के एम.एल.ए. (विधायक) गयानाथ
विश्वास का डॉ. आंबेडकर के प्रति गहरा झुकाव था।
जब यह पता चला कि वे डॉ. आंबेडकर को वोट दे सकते हैं, तो उनके कांग्रेसी ‘अभिभावकों’ ने उन्हें एक
गुप्त स्थान पर छिपा दिया, ताकि वे समय पर मतदान के लिए वहाँ न
पहुँच सकें।
लेकिन
शोषित लोगों के मुक्तिदाता डॉ. आंबेडकर के प्रति उनका आकर्षण इतना गहरा था कि
उन्होंने उस गुप्त स्थान से अपने भतीजे के माध्यम से मतदान से एक दिन पहले देर रात योगेंद्रनाथ
मंडल के पास संदेश भेजा—‘यदि उन्हें विधानसभा भवन में ले जाया
जाए, तो
वे निश्चित रूप से डॉ. आंबेडकर को वोट देंगे।’
इस समय योगेंद्रनाथ मंडल के अनुरोध पर मुस्लिम
समाज और प्रशासन ने तुरंत कार्रवाई करते हुए उस सदस्य को वहाँ से छुड़ाकर वापस ले
आए। और उन्होंने बाबासाहेब को वोट दिया।
**२) दूसरी ओर, मुकुंद बिहारी मल्लिक भी संविधान सभा के
चुनाव में उम्मीदवार बने थे। लेकिन जिन्हें वे वोट देने की उम्मीद कर रहे थे,
वे डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर को वोट देंगे—यह
बात उन्हें समझ में आ गई। अर्थात्, उन्हें एहसास हो गया कि उन्हें
निर्वाचित होने लायक पर्याप्त वोट नहीं मिलेंगे।
तब मतदान शुरू होने से एक रात पहले ख्वाजा
सर नाजिमुद्दीन के भाई ख्वाजा साहाबुद्दीन ने टेलीफोन पर योगेंद्रनाथ मंडल को बताया—
“मिस्टर मंडल, आपका अनुमान बिल्कुल सही है; अभी-अभी मिस्टर एम. बी. मल्लिक (मुकुंद
बिहारी मल्लिक) ने मुझे टेलीफोन करके बताया है कि वे डॉ. आंबेडकर को वोट देंगे।”
इस प्रकार मुसलमानों तथा मुस्लिम सरकार ने परोक्ष
रूप से बाबासाहेब का समर्थन किया था। मैं फिर से कह रहा हूँ कि उन्हें
हिंदू उम्मीदवारों को वोट देने का अधिकार नहीं था। इसलिए जो लोग कहते हैं कि मुसलमानों
ने बंगाल से बाबासाहेब को वोट देकर संविधान सभा में भेजा था—यह पूरी तरह झूठ है। मुसलमानों ने उन्हें नैतिक
समर्थन दिया था।
इस प्रकार लिखकर या अपने वक्तव्यों के
माध्यम से ‘मुसलमानों ने बाबासाहेब को संविधान सभा
में भेजा था’—इस
तरह का प्रचार करने से महाप्राण योगेंद्रनाथ मंडल तथा
शेड्यूल्ड कास्ट फेडरेशन के जीवन-मरण के संघर्ष का अपमान होता है।
हमें सही
इतिहास के बारे में जानना चाहिए। केवल पुस्तक लिखने या बड़ी-बड़ी
बातें करने से कोई महान नहीं बन जाता। हमें वास्तविक इतिहास जानना होगा और
सत्य इतिहास को सही रूप में प्रस्तुत करना होगा। महाप्राण योगेंद्रनाथ मंडल बंगाल
के ‘आंबेडकर’ हैं। उन्हें कितना भी छोटा दिखाने का प्रयास किया जाए, उनके योगदान को स्वीकार किए बिना उसका
श्रेय दूसरों को दिया जाए, या उन्हें कितनी भी गालियाँ दी जाएँ—आज
जो लोग सामाजिक रूप से पीछे रह गए हैं, उन्हें संवैधानिक रूप से जो अधिकार और
सुविधाएँ प्राप्त हो रही हैं, उनमें महाप्राण योगेंद्रनाथ मंडल का भी
योगदान है। इसी कारण उन्हें ‘महाप्राण’ की उपाधि से सम्मानित किया गया है।
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Ambedkar's Confidential letter to Jogendranath Mandal on 2nd June 1947
Ambedkar's Confidential letter to Jogendranath Mandal on 2nd June 1947 - link-
https://roymulnivasi.blogspot.com/2026/01/ambedkars-letter-to-jogendranath-mandal.html





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