Sunday, 11 October 2026

// // Leave a Comment

डॉ.बाबा साहब अम्बेडकर ने विजयादशमी के ही दिन धर्म परिवर्तन क्यो किया? लेखक—जगदीशचंद्र राय

 


डॉ.बाबा साहब अम्बेडकर ने विजयादशमी के ही दिन धर्म परिवर्तन क्यो किया? विजयादशमी और धम्मचक्र प्रवर्तन दिवस के पीछे छिपा वास्तविक इतिहास क्या है?

लेखक—जगदीशचंद्र राय

हम जानते हैं कि 14 अक्टूबर 1956 को बाबासाहेब डॉ. बी. आर. आंबेडकर ने बौद्ध धम्म स्वीकार किया था, अथवा अपने स्वधम्म में प्रत्यावर्तन किया था। सामान्यतः 14 अक्टूबर को स्मरण करते हुए इस दिन को बाबासाहेब के “बौद्ध धम्म स्वीकार दिवस अथवा स्वधम्म में प्रत्यावर्तन दिवस” के रूप में मनाया जाता है।

आइए, इस विषय पर चर्चा करें कि बाबासाहेब ने किस दिन को स्मरण करते हुए उस दिन बौद्ध धम्म स्वीकार किया था?

बाबासाहेब ने 13 अक्टूबर 1935 को महाराष्ट्र के येवला (Yeola) में घोषणा की थी— “मैंने हिंदू धर्म में जन्म लिया है, यह मेरे हाथ में नहीं था (अर्थात् इस मामले में मैं कुछ नहीं कर सकता था), लेकिन मैं हिंदू के रूप में मरूँगा नहीं।”

जिस स्थान पर बाबासाहेब ने यह ऐतिहासिक घोषणा की थी, उसे उन्होंने “मुक्तिभूमि” नाम दिया था।

 सवाल यह है कि 1935 में धर्म परिवर्तन की घोषणा की, लेकिन उन्होंने 1956 में ही धर्म परिवर्तन क्यों किया? 1935 से 1956 तक तो बहुत लंबा समय है। फिर उन्होंने 1956 को ही धम्म परिवर्तन के लिए क्यों चुना? इसके पीछे क्या कोई विशेष कारण था?

हिंदू धर्म में आस्था रखने वाले बंगालियों की दुर्गा पूजा में एक दिन दशमी का होता है। प्रचलित मान्यता के अनुसार, राम ने रावण के साथ युद्ध में विजय प्राप्त की थी, इसलिए इसे विजयादशमी कहा जाता है। लेकिन क्या वास्तव में ऐसा ही है? दुर्गा पूजा का इतिहास तो अलग है। और यदि राम की विजय के कारण विजयादशमी मनाई जाती है, तो बंगाल के बाहर बंगालियों के अलावा हिंदू धर्म में आस्था रखने वाले अन्य लोग इस पूजा को उसी रूप में क्यों नहीं मनाते?

दरअसल, विजयादशमी के इस इतिहास का एनकाउंटर किया गया है। ब्राह्मणवादियों ने अपने हितों के अनुसार इसे एक कथा का रूप दे दिया है।

अब आते हैं असली मुद्दे पर।

महाराष्ट्र में विशेष रूप से बौद्ध धम्म में आस्था रखने वाले लोग विजयादशमी को बड़े उत्साह के साथ मनाते हैं। इसका कारण यह है कि बाबासाहेब ने विजयादशमी के दिन धम्म परिवर्तन किया था।

लेकिन आम तौर पर यह प्रचारित किया जाता है कि बाबासाहेब ने 14 अक्टूबर को धर्म परिवर्तन किया था। इसके पीछे की वास्तविक घटना क्या है?

आपमें से बहुत से लोग शायद जानते होंगे कि सम्राट अशोक ने कलिंग विजय के बाद बौद्ध धम्म स्वीकार किया था। सम्राट अशोक के जीवन में धम्मानुभूति के एक महत्वपूर्ण मील के पत्थर के रूप में कलिंग विजय को माना जाता है।

उन्होंने जिस दिन बौद्ध धम्म स्वीकार किया था, वह दिन आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि थी। उन्होंने हिंसा की नीति से मुक्त होकर विजय प्राप्त की। पूरे देश में उत्सव मनाया गया—शरदोत्सव। अर्थात् शरद ऋतु का विजय उत्सव, सम्राट अशोक की धम्म-विजय का उत्सव।

कालांतर में यह उत्सव पूरे भारतवर्ष में एक राष्ट्रीय उत्सव के रूप में स्थापित हो गया।

लेकिन बाबासाहेब ने 14 अक्टूबर की तारीख को ध्यान में रखकर धम्म परिवर्तन नहीं किया था। उन्होंने एक ओर सम्राट अशोक के प्रति अपनी श्रद्धा अर्पित की, तो दूसरी ओर 1956 के अक्टूबर महीने की दशमी तिथि को ऐतिहासिक रूप से स्मरण करते हुए सभी को इस दिन का महत्व समझाने का प्रयास किया।

इसीलिए अक्टूबर महीने की दशमी तिथि को बौद्ध दृष्टिकोण से ‘अशोक विजयादशमी’ कहा जाता है।

इसी अशोक विजयादशमी के इतिहास का एनकाउंटर करके इसे ब्राह्मणवाद की विजयादशमी में रूपांतरित कर दिया गया।

यहाँ एक सवाल उठता है कि बाबासाहेब ने 1935 में घोषणा की थी कि वे हिंदू धर्म त्याग देंगे, लेकिन दूसरे धर्म को स्वीकार करने के लिए उन्होंने 1956 तक इंतज़ार क्यों किया?

इसके पीछे निश्चित रूप से बाबासाहेब की गहरी सोच रही होगी। आखिर वह गहरी सोच क्या थी?

वह गहरी सोच यह थी कि 1956 में गौतम बुद्ध के संघ में प्रवेश के 2500 वर्ष पूरे हो रहे थे। ऐतिहासिक दृष्टि से यह अवसर अत्यंत महत्वपूर्ण था।

गौतम बुद्ध का जन्म 563 ईसा पूर्व में हुआ था। उन्होंने 19 वर्ष की आयु में संघ में प्रवेश किया था, जो संघ की परंपरा के अनुसार था। बुद्ध के संघ में प्रवेश के 2500 वर्ष 1956 में पूरे हो रहे थे।(563 − 19 = 544; 544 + 1956 = 2500)

इस दिन को ऐतिहासिक रूप से स्मरण करने के लिए बाबासाहेब ने 1956 में बौद्ध धम्म स्वीकार किया था, अथवा अपने स्वधम्म में पुनः लौटे थे।

अब इस एनकाउंटर के इतिहास पर कुछ चर्चा करते हैं। इसके बाद हम फिर से इस दिन के बारे में चर्चा करेंगे।

जब ब्राह्मणवादियों ने प्रतिक्रांति की, अर्थात् 185 ईसा पूर्व में पुष्यमित्र शुंग ने सम्राट अशोक के परपोते (चौथी पीढ़ी के वंशज) बृहद्रथ की हत्या करके ब्राह्मणवाद की शुरुआत की, तो उसके बाद ही रामायण की रचना हुई।

इससे पहले राम और रावण का अस्तित्व ही नहीं था।

रावण के प्रतीक के रूप में उन्हें राक्षस और अशुभ का प्रतीक घोषित किया गया। रावण को दस सिरों वाला भी दिखाया गया।

दरअसल, बौद्ध धर्म में ‘दस पारमिताओं’ को विशेष महत्व दिया जाता है। इसी कारण रावण को दस सिरों वाला बनाकर दिखाया गया।

लेकिन सवाल यह है कि रावण को आठ, नौ या ग्यारह सिरों वाला क्यों नहीं दिखाया गया?

ब्राह्मणवादियों द्वारा प्रतिक्रांति किए जाने के बाद से ही भारत में विजयादशमी को एक उत्सव के रूप में मनाया जाने लगा। सम्राट अशोक ने दशमी के दिन जो विजय प्राप्त की थी, उसे समाप्त करने के लिए षड्यंत्र रचा गया।

मराठी में इसे ‘दसरा’ कहा जाता है, जबकि हिंदी में लोग इसे ‘दशहरा’ कहते हैं। दस सिरों वाले रावण के आधार पर इसे ‘दशहरा’ नाम दिया गया और विजयादशमी की मूल परंपरा को समाप्त कर दिया गया।

इसी उद्देश्य से रावण के पुतले जलाने की परंपरा शुरू की गई।

अब वापस अपनी पिछली चर्चा पर आते हैं।

बाबासाहेब ने जिस दिन धम्म स्वीकार किया था, उसमें यहाँ 14 अक्टूबर की तारीख उतनी महत्वपूर्ण नहीं है। महत्वपूर्ण है—‘अशोक विजयादशमी’, जो 1956 में मनाई गई थी। और वह दिन 14 अक्टूबर था।

इसलिए क्या हमें बाबासाहेब के धर्मांतरण के दिन को केवल 14 अक्टूबर कहने के बजाय ‘अशोक विजयादशमी’ के दिन के रूप में कहना या लिखना नहीं चाहिए?

बाबासाहेब का उद्देश्य आश्विन मास के शरद शुक्ल पक्ष की विजयादशमी को मनाना था। सम्राट अशोक के धम्म परिवर्तन के दिन को अंग्रेज़ी कैलेंडर की तारीख के अनुसार नहीं मनाया गया था। लेकिन वर्ष 1956 में 14 अक्टूबर का दिन अशोक विजयादशमी का दिन था।

इसलिए हमें भी विजयादशमी को सम्राट अशोक के ‘अशोक विजयादशमी’ दिवस और बाबासाहेब के ‘धम्मचक्र प्रवर्तन दिवस’ के रूप में मनाना चाहिए।

क्योंकि बाबासाहेब ने जिस दिन, अर्थात् इसी अशोक विजयादशमी के दिन, बौद्ध धम्म स्वीकार किया था, उसे ‘धम्मचक्र प्रवर्तन दिवस’ कहा जाता है।

अर्थात् सम्राट अशोक द्वारा बौद्ध धम्म स्वीकार करने के दिन को ‘अशोक विजयादशमी’ कहा जाता है, और इसी अशोक विजयादशमी के दिन बाबासाहेब द्वारा बौद्ध धम्म स्वीकार करने के अवसर को एक नया नाम दिया गया—‘धम्मचक्र प्रवर्तन दिवस’।

धम्मचक्र प्रवर्तन का अर्थ है—बौद्ध धम्म की विचारधारा के चक्र को गतिशील बनाना, जिसमें समता, स्वतंत्रता, बंधुता और न्याय के सिद्धांत शामिल हैं।

मेरा मानना है कि इस इतिहास को जानना हमारे लिए अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि सही इतिहास ही हमें सही दिशा दिखाता है। आशा है कि यह लेख हमारी वर्तमान और आने वाली पीढ़ियों को सही इतिहास जानने में सहायता करेगा।

(जानकारी:- Speech of Waman meshram -BAMCEF President.

 https://youtu.be/HokT-ugzW1c?si=rUuSKwc0jo8VfCg-





https://youtu.be/9XkHICCs9V4?si=api7eUbQ-Ak1xnWq


0 comments:

Post a Comment