हिन्दू कोड बिल और आरक्षण में महाप्राण जोगेन्द्रनाथ मंडल का योगदान
लेखक –
जगदीशचन्द्र राय
(इस लेख के विशेष रूप से उल्लेखनीय विषय
हैं—
1. हिंदू कोड बिल की प्रारंभिक तैयारी,
2. बाबासाहेब के महापरिनिर्वाण के बाद
बौद्धों के लिए अनुसूचित जाति आरक्षण को बनाए रखने का प्रयास,
3. बी. एन. लोकुर समिति की सिफारिशों को
निरस्त कराकर बंगाल के नमःशूद्र, राजबंशी,
धोपा तथा सूड़ी (साहा) समुदायों के
अनुसूचित जाति आरक्षण को जारी रखना,
4. बाबासाहेब के गोपनीय पत्र के
निर्देशानुसार पाकिस्तान में ही रह जाना, तथा
5. बाबासाहेब के जीवन के अंतिम समय में
उनसे भेंट करना।)
हम सभी लगभग
यह जानते हैं कि हिन्दू कोड बिल का प्रारूप डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने तैयार किया
था। लेकिन इस विधेयक का प्रारंभिक मसौदा सबसे पहले किसने तैयार किया था, यह बात हममें से बहुत से लोग नहीं जानते।
आइए, इस विषय पर विस्तार से चर्चा करें।
हिन्दू समाज
की महिलाओं के अधिकारों के संबंध में अंग्रेज़ शासन ने समय-समय पर अनेक कानूनी
सुधार किए। चूँकि हिन्दुओं के पास ऐसा कोई सर्वमान्य और निश्चित धर्मग्रंथ नहीं था, जिसके आधार पर पूरे समाज में एक समान कानून लागू
किया जा सके, इसलिए स्थान, काल, परिस्थितियों तथा परम्पराओं के अनुसार अलग-अलग नियम प्रचलित थे। अंग्रेज़
शासकों ने भारतीय महिलाओं के मानवीय अधिकारों को कानूनी संरक्षण देने के उद्देश्य
से अनेक कानून बनाए। जैसे—
- जातिगत अयोग्यता निवारण अधिनियम – 1850
- हिन्दू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम – 1856
- भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम – 1925
- धर्म परिवर्तन करने वालों के विवाह-विच्छेद
संबंधी अधिनियम – 1866
- संपत्ति हस्तांतरण अधिनियम – 1882 (संशोधन – 1929)
- भारतीय वयस्कता अधिनियम – 1875
6(1). भारतीय विवाह-विच्छेद अधिनियम – 1889
7.
भारतीय वयस्कता अधिनियम – 1875
- संपत्ति हस्तांतरण (पूरक) अधिनियम – 1914, 1916 तथा 1921
- हिन्दू अध्ययन सुविधा अधिनियम – 1930
- हिन्दू महिलाओं के संपत्ति अधिकार अधिनियम
– 1937
हिन्दू
कानूनों के संशोधन और संहिताकरण (Codification)
का कार्य ब्रिटिश सरकार द्वारा गठित समितियों के
माध्यम से काफी पहले से चल रहा था। वर्ष 1941 में सर बी. एन. राव को इस समिति का अध्यक्ष नियुक्त किया गया। समिति ने पूरे देश का भ्रमण कर विभिन्न वर्गों और विद्वानों से राय एकत्र
की। इसके बाद समिति ने अपनी रिपोर्ट अंतरिम सरकार के विधि मंत्री महाप्राण
जोगेन्द्रनाथ मंडल को प्रस्तुत की।
उक्त
कानूनों को अधिक प्रभावी और विकसित स्वरूप प्रदान करने के उद्देश्य से महाप्राण
जोगेन्द्रनाथ मंडल ने 4 नवम्बर 1946 को अंतरिम
सरकार के विधि मंत्री का पद ग्रहण करने के बाद 'हिन्दू कोड बिल' का प्रारंभिक मसौदा तैयार किया और वर्ष 1946 में उसे केंद्रीय विधान सभा
में प्रस्तुत किया। किंतु विधेयक प्रस्तुत किए
जाने के कुछ ही दिनों बाद भारत विभाजन का प्रश्न राष्ट्रीय राजनीति का प्रमुख विषय
बन गया। परिणामस्वरूप महाप्राण जोगेन्द्रनाथ मंडल को हिन्दू कोड बिल पर आगे कार्य
करने का अवसर नहीं मिल सका।
देश विभाजन
की जटिल परिस्थितियों के कारण हिन्दू कोड बिल पर संसद में आगे कोई चर्चा नहीं हो
सकी और वह विधेयक वहीं लंबित रह गया। 1947 में भारत विभाजन के बाद स्वतंत्र भारत के प्रथम विधि मंत्री डॉ. बाबासाहेब
आंबेडकर बने। उन्होंने सामाजिक असमानता को समाप्त करने तथा महिलाओं के अधिकारों की
स्थापना के लिए निरंतर संघर्ष किया।
इसी संदर्भ
में महाप्राण जोगेन्द्रनाथ मंडल द्वारा तैयार किए गए हिन्दू कोड बिल के प्रारूप का
उपलब्ध होना डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर के लिए अत्यंत सहायक सिद्ध हुआ। सामाजिक समानता
और महिलाओं के अधिकारों को कानूनी मान्यता प्रदान करने के लिए विधि मंत्री के रूप
में डॉ. आंबेडकर निश्चित रूप से अपना महान दायित्व निभाते। किन्तु हिन्दू कोड बिल
जैसा एक प्रारंभिक मसौदा पहले से ही विधान सभा में उपलब्ध था, जिसे अखंड भारत की ब्रिटिश भारतीय विधान सभा में
अंतरिम सरकार के विधि मंत्री महाप्राण जोगेन्द्रनाथ मंडल ने प्रस्तुत किया था।
महाप्राण
द्वारा प्रस्तुत उसी हिन्दू कोड बिल का मसौदा बाद में डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर के
हाथों पहुँचा। उन्होंने उस मसौदे को और अधिक परिष्कृत, व्यावहारिक तथा समयानुकूल रूप देकर संसद में
प्रस्तुत किया, जो आगे चलकर ऐतिहासिक हिन्दू कोड बिल के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
अब बहुत से
लोग यह प्रश्न कर सकते हैं कि हिन्दू कोड बिल का प्रारंभिक मसौदा महाप्राण
जोगेन्द्रनाथ मंडल ने तैयार किया था, इसका प्रमाण क्या है? अब मैं उसी
विषय से संबंधित मूल तथ्यों को प्रस्तुत करने का प्रयास कर रहा हूँ। जिज्ञासु पाठक
स्वयं इन तथ्यों का परीक्षण और सत्यापन कर सकते हैं।
Sixth Legislative Assembly 1947, 3rd Session, Volume V - Pg
3327 Hindu Code Bill
HINDU CODE
The Honourable Mr. Jogendra Nath Mandal (Law Member): Sir, I move for leave to
introduce a Bill to amend and codify certain branches of the Hindu Law.
Mr. President: The question is:
“That leave be
granted to introduce a Bill to amend and codify certain branches of the Hindu
Law.”
The motion was
adopted.
The Honourable
Mr. Jogendra Nath Mandal: Sir, I introduce the Bill. With your permission I
want to make mention of one other, point, as the Honourable Members of this
House might be interested to know what steps Government propose to take
regarding this Bill. Government propose to circulate the Bill by Executive
Order for eliciting public opinion, and on receipt of public opinion Government
propose to move a motion in the next Session of the Assembly for the reference
of the Bill to a Joint Committee of both the Houses of Legislature. I only wanted
to make this known to the Honourable Members of this House.
हिन्दू कोड बिल (भाग–2) के विवाह एवं भरण-पोषण विषयक बहस के दौरान श्री नज़ीरुद्दीन अहमद ने कहा—
“When the Bill was prepared it was introduced by Mr. Jogendra
Nath Mandal, the Minister of Law of the Interim Government.”
(Dr. Babasaheb Ambedkar: Writings and Speeches, Vol. 14,
Part–1, p. 534)
अर्थात्, "जब इस
विधेयक का प्रारूप तैयार किया गया था, तब इसे अंतरिम सरकार के विधि मंत्री
श्री जोगेन्द्रनाथ मंडल ने प्रस्तुत किया था।"
Mr. Naziruddin Ahmad: I submit that the original Bill was
introduced by Mr. Jogendra Nath Mandal. It bears the printing date 1st, August
1946. This was the Bill which was sent to the Select Committee. A Bill printed
on 16th August 1948 is the Bill that came out of the Select Committee with the
report. (Vol -14, part-1, p- 450)
जब इस विधेयक पर संविधान सभा में विचार-विमर्श हो
रहा था, तब श्री
नज़ीरुद्दीन अहमद ने एक अन्य अवसर पर कहा—
“He (यहां He मतलब महान बाबासाहेब है) pointed out with
commendable thoroughness the departures made in the Final Bill from the
Original Mr. Jogendra Nath Mondal's Bill.”
(स्रोत: Dr.
Babasaheb Ambedkar: Writings and Speeches, Vol. 14, Part–1, p. 467)
अर्थात्, उन्होंने (यहाँ "उन्होंने" से
अभिप्राय डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर से है) अत्यंत सराहनीय विस्तार और गहनता के साथ यह
स्पष्ट किया कि अंतिम विधेयक में श्री जोगेन्द्रनाथ मंडल के मूल विधेयक से किन-किन
बिंदुओं पर परिवर्तन किए गए थे।
इसी प्रकार, संविधान सभा में इस विधेयक पर विचार के
दौरान एक अन्य स्थान पर श्री नज़ीरुद्दीन अहमद ने कहा—
“It is easy for anyone who has the
patience to compare the original Bill presented by Mr. Jogendra Nath Mandal to
the House with the revised Bill to see the difference.”
(स्रोत: वही, पृ. 466)
अर्थात्,
जिस किसी में धैर्य
है, उसके
लिए श्री जोगेन्द्रनाथ मंडल द्वारा सदन में प्रस्तुत मूल विधेयक की संशोधित विधेयक
से तुलना करके दोनों के बीच का अंतर देखना सरल है।
संविधान सभा की कार्यवाही के दौरान अध्यक्ष (स्पीकर) ने कहा—
“श्री जोगेन्द्रनाथ मंडल द्वारा प्रस्तुत
मूल विधेयक की योजना तथा उसकी विषयवस्तु में व्यापक परिवर्तन किए गए हैं।” (क)
इसके
पश्चात् श्री नज़ीरुद्दीन अहमद ने सदस्यों के समक्ष स्पष्ट करते हुए
कहा—
“अतः श्री जोगेन्द्रनाथ मंडल द्वारा
प्रस्तुत विधेयक को डॉ. आंबेडकर ने अनौपचारिक (Informal) विधेयक का रूप दिया था।” (ख)
इसी
संदर्भ में, सरदार
बी. एस. मान ने सिख समुदाय की ओर से इस विधेयक पर
अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा—
“यद्यपि डॉ. आंबेडकर माननीय जोगेन्द्रनाथ
मंडल द्वारा तैयार किए गए हिन्दू कोड बिल को और अधिक विकसित करने का प्रयास कर रहे
हैं, फिर
भी इस विधेयक को जोगेन्द्रनाथ मंडल की संतान (Offspring) कहा जाएगा।” (ग)
उपरोक्त
तीनों उद्धरण—(क), (ख) तथा (ग)—का संदर्भ ‘महाप्राण जोगेन्द्रनाथ मंडल : जीवन और
विचार’, लेखक शीलप्रिय
बौद्ध, पृष्ठ 80–81 से
लिया गया है।
अब आइए देखें कि डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने स्वयं अपने
वक्तव्य में क्या कहा था—
“Now I came to an important circumstance
to which I would like to make definite reference. The House will remember that
after the Bill was introduced in the House by Mr. Mandal—and it was introduced
after the Rau Committee’s investigation was complete—even then Government
promised that they would issue an executive circular to the various provincial
Governments and invite their opinion on the Bill as introduced. That circular
was also sent to Punjab.”
(स्रोत: Dr. Babasaheb Ambedkar: Writings and Speeches,
Vol. 2, p. 1173)
अर्थात्, “अब मैं एक महत्वपूर्ण परिस्थिति की ओर
आता हूँ, जिसका
मैं विशेष रूप से उल्लेख करना चाहता हूँ। सदन को स्मरण होगा कि यह विधेयक श्री
मंडल द्वारा प्रस्तुत किया गया था। इसे राउ समिति की जाँच पूरी होने के बाद
प्रस्तुत किया गया था। इसके पश्चात सरकार ने यह आश्वासन दिया था कि वह विभिन्न
प्रांतीय सरकारों को एक कार्यकारी परिपत्र (Executive Circular) भेजेगी और प्रस्तुत विधेयक पर उनके
विचार आमंत्रित करेगी। यह परिपत्र पंजाब सरकार को भी भेजा गया था।”
अंत में यह उल्लेख करना उचित होगा कि डॉ.
संजय गजभिये, जिन्होंने महाप्राण
जोगेन्द्रनाथ मंडल और डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर पर पीएच.डी. की है,
अपनी पुस्तक “संवैधानिक भारत के निर्माता : डॉ.
बाबासाहेब आंबेडकर और महाप्राण जोगेन्द्रनाथ मंडल” में इस विषय पर विस्तार से चर्चा करते
हैं। उन्होंने कुछ समय पूर्व एक लाइव व्याख्यान में यह भी कहा था कि—
“हिन्दू कोड बिल के जनक (या मूल
शिल्पकार) महाप्राण जोगेन्द्रनाथ मंडल हैं।”
उपरोक्त संदर्भों से यह स्पष्ट होता है
कि “मंडलजी द्वारा तैयार किए गए तथा डॉ.
आंबेडकर द्वारा संशोधित एवं विस्तारित हिन्दू कोड बिल का जब विरोध किया गया,
तब डॉ. आंबेडकर ने
उसका अत्यंत प्रभावशाली ढंग से सामना किया। उन्होंने हिन्दुओं, सिखों, पारसियों, ईसाइयों तथा मुसलमानों के लिए तार्किक,
विधिसम्मत और अकाट्य
तर्क प्रस्तुत कर विरोधियों को समझाने का प्रयास किया। उनके अथक प्रयासों के
परिणामस्वरूप 17 नवम्बर
1947 से
25 सितम्बर
1951 तक
डॉ. आंबेडकर ने, अपनी
अस्वस्थता के बावजूद अनेक जोखिम उठाते हुए, अत्यंत बुद्धिमत्ता और दृढ़ता के साथ
हिन्दू कोड बिल के पक्ष में संघर्ष किया। किन्तु रूढ़िवादी शक्तियों ने भारतीय
महिलाओं के अधिकारों से संबंधित हिन्दू कोड बिल को स्वीकार नहीं किया।” (स्रोत : महाप्राण जोगेन्द्रनाथ मंडल : जीवन और
विचार, लेखक – शीलप्रिय बौद्ध, पृष्ठ 80–81।)
यहाँ एक महत्वपूर्ण तथ्य स्मरण रखना
आवश्यक है कि जिस समय डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर भारत की संसद में हिन्दू
कोड बिल के समर्थन में सशक्त संघर्ष कर रहे थे, उसी समय महाप्राण जोगेन्द्रनाथ मंडल पाकिस्तान के
संविधान-निर्माण में सक्रिय भूमिका निभा रहे थे। साथ ही वे वहाँ के हिन्दू
और बौद्ध समुदायों के लिए उनकी जनसंख्या के अनुपात में
संवैधानिक आरक्षण तथा अन्य अधिकारों की स्थापना के उद्देश्य से निरंतर प्रयासरत
थे।
देश-विभाजन तथा विशेष रूप से बंगाल
विभाजन के बाद पूर्वी बंगाल के असहाय और निरपराध गैर-मुस्लिम समुदायों
का नेतृत्व करने वाला कोई प्रभावशाली व्यक्ति दिखाई नहीं दे रहा था। ऐसी
परिस्थितियों में जोगेन्द्रनाथ मंडल स्वयं भी अत्यंत
दुविधा और असमंजस की स्थिति में पड़ गए। तब उन्होंने अपने राजनीतिक मार्गदर्शक डॉ.
बाबासाहेब आंबेडकर को पत्र लिखा। वे डॉ. आंबेडकर को अपना राजनीतिक
गुरु मानते थे। इसलिए इस गंभीर परिस्थिति में उन्हें क्या करना
चाहिए, इस संबंध में
उन्होंने डॉ. आंबेडकर से मार्गदर्शन चाहा। इसके उत्तर में डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर
ने 2 जून 1947 को उन्हें एक पत्र लिखा। उस पत्र की कुछ
पंक्तियाँ यहाँ उद्धृत की जा रही हैं। (पूरा पत्र परिशिष्ट में संलग्न है।)
“The only course left to the Scheduled castes is to fight for
safeguards either in United Bengal or a divided Bengal. ---- I agree that you
should work in alliance with the League and secure adequate safeguards for
them. ----The Muslim League, however, will be ready to give to the Scheduled
Castes separate electorates more probably because they themselves want separate
electorates for their own community. So far as the Eastern Bengal Scheduled
Castes are concerned that no doubt is an advantage.” (स्रोत: महाप्राण
योगेन्द्रनाथ, लेखक- जगदीश चन्द्र
मण्डल, खण्ड 4, पृष्ठ 2-4)
डॉ. बाबासाहेब
आंबेडकर की सलाह के अनुसार वे भारत न आकर अपने समाज के गरीब और असहाय लोगों के हित
में पूर्वी पाकिस्तान में ही रुके रहे। दुःख की बात यह है कि बाबासाहेब के इस पत्र
के बारे में आज भी अधिकांश लोग या तो जानते ही नहीं हैं, अथवा जानकर भी अनजान बनने का प्रयास
करते हैं और उनके विरुद्ध दुष्प्रचार करते रहते हैं।
इसके पश्चात उन्होंने पूर्वी पाकिस्तान
के अनुसूचित जाति तथा अन्य समुदायों के नेताओं से विचार-विमर्श किया और उनके
परामर्श के आधार पर 15 अगस्त 1947 को पाकिस्तान की मुस्लिम लीग सरकार में विधि
एवं श्रम मंत्री के रूप में पदभार ग्रहण किया।
मंत्रिमंडल में सम्मिलित होने के बाद
उन्होंने अनुसूचित जातियों के हितों की रक्षा के लिए अनेक महत्वपूर्ण कदम उठाए।
किन्तु उनके इस मंत्रिमंडल में शामिल होने को मुहम्मद अली जिन्ना, ख्वाजा नाज़िमुद्दीन और हुसैन
शहीद सुहरावर्दी को छोड़कर अधिकांश लोग सहज रूप से
स्वीकार नहीं कर पा रहे थे। विशेष रूप से प्रधानमंत्री लियाकत अली ख़ान इसके विरोधी थे। यहीं
से जोगेन्द्रनाथ मंडल को सत्ता से हटाने और राजनीतिक रूप से अलग-थलग करने की
प्रक्रिया आरम्भ हुई।
इसी बीच महाप्राण जोगेन्द्रनाथ मंडल ने
पाकिस्तान के संविधान का प्रारूप तैयार कर उसे मुहम्मद अली जिन्ना सहित अनेक
प्रमुख नेताओं को दिखाया तथा उनसे पूर्व-परामर्श भी किया। किन्तु दुर्भाग्यवश,
अचानक जिन्ना का असामयिक निधन हो गया।
सामान्यतः यह कहा जाता है कि उनकी मृत्यु तपेदिक (टीबी) के कारण हुई थी। केवल
संविधान का प्रश्न ही नहीं, बल्कि
जिन्ना की सभी धर्मों के प्रति उदार और धर्मनिरपेक्ष दृष्टि भी पश्चिमी पाकिस्तान
के कट्टर इस्लामी मौलवादियों को स्वीकार्य नहीं थी। जिन्ना सुधारवादी विचारों के
समर्थक थे। वे मंदिर, मस्जिद,
गिरजाघर तथा सभी धर्मों के नाम पर होने
वाले धार्मिक व्यवसाय और कट्टर धार्मिक नेतृत्व के आलोचक थे। यहाँ तक कि यह भी कहा
जाता है कि उन्होंने अपने जीवन में कभी नियमित नमाज़ नहीं पढ़ी। दूसरी ओर
कट्टरपंथी मौलवी इस्लाम में किसी भी प्रकार के सुधार के विरोधी थे।
जिन्ना की मृत्यु के साथ ही महाप्राण
जोगेन्द्रनाथ मंडल द्वारा हिन्दुओं तथा अन्य सभी अल्पसंख्यकों के अधिकारों और
सुरक्षा की स्थापना के लिए चलाया जा रहा संघर्ष भी अत्यन्त कठिन स्थिति में पहुँच
गया। इसके परिणामस्वरूप पूर्वी और पश्चिमी पाकिस्तान में हिन्दुओं सहित अन्य
अल्पसंख्यकों पर पश्चिमी पाकिस्तान के शासकों द्वारा अत्याचार और दमन बढ़ने लगा।
जब महाप्राण जोगेन्द्रनाथ मंडल के जीवन
पर भी संकट उत्पन्न हुआ, तब
1950 में अपने
कोलकाता-स्थित पुत्र की अस्वस्थता का कारण बताकर वे कोलकाता आ गए। कुछ समय तक
परिस्थितियों का गंभीरता से आकलन करने के बाद उन्होंने पाकिस्तान सरकार के
मंत्रिपद से त्यागपत्र दे दिया।
महाप्राण 1950 में भारत लौट आए। उस समय भारत की संसद
में हिन्दू
कोड बिल को लेकर तीव्र राजनीतिक संघर्ष चल रहा था। महाप्राण
जोगेन्द्रनाथ मंडल डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर का इतना सम्मान और विश्वास करते थे कि
हिन्दू कोड बिल पर चल रहे उस ऐतिहासिक संघर्ष के दौरान उन्होंने एक बार भी यह दावा
नहीं किया कि इस विधेयक का मूल प्रारूप उन्होंने तैयार किया था। इससे एक बार फिर
उनकी उदारता, विनम्रता और महानता
का परिचय मिलता है। यही कारण है कि उन्हें ‘महाप्राण’ की उपाधि से सम्मानित
किया गया।
हममें से बहुत से लोग जानते हैं कि 1965 में लकुड़
समिति (Lakur Committee) की
सिफारिशों को निरस्त कराने के लिए उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल
बहादुर शास्त्री से हस्तक्षेप का अनुरोध किया और अंततः
उन सिफारिशों को निरस्त कराने में सफल हुए। परिणामस्वरूप आज भी बंगाल के नमःशूद्र,
राजवंशी, धोबी, साहा (सूड़ी) सहित पूरे भारत की
कुल 29 जातियाँ आरक्षण का लाभ प्राप्त कर रही हैं।
किन्तु यह तथ्य बहुत कम लोगों को ज्ञात
है कि 1957 में पंडित जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व वाली
कांग्रेस सरकार ने बौद्ध धर्म ग्रहण कर चुके अनुसूचित जाति समाज को आरक्षण के सभी
लाभों से वंचित करने का निर्णय लिया था। 1956 में डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर का निधन हो
चुका था। इसलिए बौद्ध धर्म स्वीकार कर चुके अनुसूचित जाति एवं आदिवासी समाज के
सामने एक गंभीर संकट उत्पन्न हो गया। उनके अधिकारों की रक्षा के लिए नेतृत्व देने
वाला कोई प्रभावशाली व्यक्ति उन्हें दिखाई नहीं दे रहा था। बौद्ध धर्म स्वीकार
करने वालों में सर्वाधिक संख्या डॉ. आंबेडकर के अपने राज्य महाराष्ट्र के महार
समुदाय की थी।
अंततः
बौद्ध धर्म ग्रहण कर चुके अनुसूचित जाति एवं आदिवासी समाज के प्रतिनिधियों ने
आरक्षण का अधिकार बनाए रखने के उद्देश्य से महाप्राण जोगेन्द्रनाथ मंडल से संपर्क
किया और उनसे अनुरोध किया— “आप ही कुछ कीजिए।”
तब
महाप्राण ने प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को एक पत्र लिखा।
उसके उत्तर में नेहरूजी ने लिखा—
“मुझे व्यक्तिगत रूप से कोई आपत्ति नहीं
है, किन्तु
मुझे लगता है कि भारत का संविधान इसकी अनुमति नहीं देता।”
इस
पर जोगेन्द्रनाथ मंडल ने उत्तर दिया—
“शायद आप भूल गए हैं कि अंतरिम सरकार का
विधि मंत्री मैं था। इसलिए भारतीय संविधान में कहाँ-कहाँ कानूनी बाधाएँ हैं और
कहाँ-कहाँ अवसर उपलब्ध हैं, इससे मैं भली-भाँति परिचित हूँ। Caste is by birth (जाति जन्म से होती है), अतः इस मामले में कोई संवैधानिक बाधा
नहीं है।” (स्रोत:
जगदीश चंद्र मंडल का साक्षात्कार, इतिहास के परिप्रेक्ष्य में महाप्राण,
पृष्ठ 62)
योगेंद्रनाथ मंडल ने नेहरूजी को आगे लिखा—“No where is our Constitution the terminology “Scheduled Castes,” Has been
defined except a reference to Article 341 which again refers to the
notification of the president specifying the castes which shall be deemed to be
Scheduled Castes for the purpose of this Constitution. There is no mention
anywhere that the communities to be included in the list Scheduled Castes shall
profess Hindu religion. Many I reiterate, religion was never taken to be
the criterion in this regard.
--May I
Point out to you in this connection, that although the Sikhs do not subscribe
to caste system, the following four castes among the Sikhs viz Mazhabi,
Ramdasi, Kabirpanthi and Sikligar have been included in the President’s
constitution (Scheduled Castes) order 1950.
“हमारे
संविधान में ‘अनुसूचित जाति’ (Scheduled Castes) शब्द की कहीं भी परिभाषा नहीं दी गई है।
केवल अनुच्छेद 341 का
उल्लेख है, जिसमें राष्ट्रपति
द्वारा जारी उस अधिसूचना का संदर्भ है, जिसके माध्यम से उन जातियों को इस संविधान के प्रयोजनों के लिए
अनुसूचित जाति माना जाएगा। संविधान में कहीं भी यह नहीं कहा गया है कि अनुसूचित
जातियों की सूची में शामिल समुदायों के लिए हिंदू धर्म का पालन करना अनिवार्य
होगा। मैं पुनः स्पष्ट करना चाहता हूँ कि इस संबंध में धर्म को कभी भी मानदंड (Criterion)
नहीं माना गया।”
उन्होंने
आगे लिखा—
“मैं
इस संदर्भ में आपका ध्यान इस तथ्य की ओर आकर्षित करना चाहता हूँ कि यद्यपि सिख
धर्म जाति-व्यवस्था को स्वीकार नहीं करता, फिर भी सिख समुदाय की निम्नलिखित चार जातियाँ— मझबी
(Mazhabi), रामदासी
(Ramdasi), कबीरपंथी
(Kabirpanthi) और
सिकलीगर (Sikligar)— को राष्ट्रपति
के संविधान (अनुसूचित जातियाँ) आदेश, 1950 में अनुसूचित जातियों की सूची में शामिल
किया गया है।”
(स्रोत– महाप्राण योगेंद्रनाथ,
खंड–7, लेखक– जगदीश चंद्र मंडल,
पृष्ठ 85–86)
इस प्रकार, कानून की विभिन्न धाराओं का उल्लेख करते
हुए योगेंद्रनाथ मंडल ने पत्राचार के माध्यम से जवाहरलाल नेहरू के समक्ष बौद्ध
धर्म में धर्मांतरित लोगों को आरक्षण का लाभ दिए जाने के पक्ष में दृढ़तापूर्वक
अपना पक्ष रखा। महाप्राण योगेंद्रनाथ मंडल ने जवाहरलाल नेहरू के साथ इस विषय पर
गंभीर वैचारिक संघर्ष किया और अंततः बौद्धों को आरक्षण के दायरे में बनाए रखने में
सफलता प्राप्त की। यहाँ भी योगेंद्रनाथ मंडल की महानता और उनके उदात्त व्यक्तित्व
की झलक मिलती है। इसी कारण उन्हें ‘महाप्राण’ की उपाधि से सम्मानित किया जाता
है।
यहीं महाप्राण योगेंद्रनाथ मंडल और
बाबासाहेब की महानता भी स्पष्ट होती है। प्रायः यह कहा जाता है कि 1950
से 1956 के बीच बाबासाहेब और महाप्राण के बीच
कोई संपर्क नहीं था। किंतु
वास्तविकता यह है कि ये दोनों महापुरुष आजीवन समाज-कल्याण के कार्यों में एक-दूसरे
के सच्चे सहयोगी और समान उद्देश्य से प्रेरित रहे। इस संदर्भ में उल्लेखनीय है कि
डॉ. राम मनोहर लोहिया का स्वप्न था कि देश के विभिन्न भागों में वंचित एवं शोषित
लोगों के हित में कार्य करने वाले संगठनों तथा राजनीतिक शक्तियों को डॉ. भीमराव
आंबेडकर के नेतृत्व में एक साझा मंच पर संगठित किया जाए। इसी उद्देश्य से 1956
के उत्तरार्ध में बिहार के पटना में एक
तैयारी बैठक आयोजित की गई। महाप्राण योगेंद्रनाथ मंडल इस बैठक में उपस्थित थे और
उन्होंने सक्रिय भूमिका निभाई। किंतु अस्वस्थता के कारण डॉ. आंबेडकर स्वयं उस बैठक
में शामिल नहीं हो सके। परिणामस्वरूप डॉ. राम मनोहर लोहिया ने ही बैठक की
अध्यक्षता की।
इससे पहले भी अनेक प्रयासों के बावजूद
योगेंद्रनाथ मंडल की डॉ. आंबेडकर से प्रत्यक्ष भेंट नहीं हो सकी थी। बाबासाहेब की
अत्यधिक व्यस्तता तथा उनका अस्वस्थ स्वास्थ्य बार-बार इस अवसर में बाधा बनता रहा।
इसलिए उन्हें आशा थी कि पटना के इस सम्मेलन में दोनों के बीच विस्तृत चर्चा होगी
और भविष्य की कार्ययोजना के संबंध में उन्हें आवश्यक मार्गदर्शन प्राप्त होगा।
यह भी उल्लेखनीय है कि देश-विभाजन के
बाद शेड्यूल्ड कास्ट्स फेडरेशन का केंद्रीय कार्यालय तथा उसकी अधिकांश संगठनात्मक
संपत्तियाँ ढाका स्थानांतरित हो गई थीं। संगठन के अधिकांश समर्थक भी पूर्वी
पाकिस्तान के अंतर्गत आने वाले क्षेत्रों में रह गए थे। फलस्वरूप स्वतंत्रता के
बाद पश्चिम बंगाल में फेडरेशन की गतिविधियाँ लगभग समाप्ति के कगार पर पहुँच गईं।
ऐसी जटिल परिस्थिति में संगठन के पुनर्गठन तथा उसके भावी कार्यक्रमों पर डॉ.
आंबेडकर से विचार-विमर्श करना योगेंद्रनाथ मंडल के लिए अत्यंत आवश्यक था।
किन्तु नियति को कुछ और ही मंजूर था।
अचानक डॉ. आंबेडकर का स्वास्थ्य गंभीर रूप से बिगड़ गया और वर्षों से अपेक्षित वह
विस्तृत चर्चा संभव न हो सकी। पटना का कार्यक्रम संक्षिप्त कर योगेंद्रनाथ मंडल
शीघ्र ही दिल्ली पहुँचे, ताकि
अपने प्रिय नेता और आजीवन संघर्ष के सहयात्री से मिल सकें।
दिल्ली पहुँचकर जब उन्होंने डॉ. आंबेडकर
की शारीरिक स्थिति देखी, तो
वे अत्यंत व्यथित हो उठे। उन्हें आभास हो गया था कि अब समय बहुत कम शेष है। और वास्तव में, कुछ ही दिनों बाद 6 दिसंबर 1956 की रात्रि में भारत के शोषित एवं वंचित
समाज की मुक्ति के महानतम स्वर, बाबासाहेब
डॉ. भीमराव आंबेडकर, निद्रा
में ही इस संसार से सदा के लिए विदा हो गए।
इस दुःखद समाचार से महाप्राण
योगेंद्रनाथ मंडल शोक से विह्वल हो उठे। अनेक दिनों तक उनकी रातें जागते हुए
बीतीं। कोलकाता के 64, सुल्तान
आलम रोड स्थित उनके निवास पर उनके अनुयायियों ने उनके अध्यक्षत्व में एक शोकसभा का
आयोजन किया। किंतु उस सभा में शोकाकुल योगेंद्रनाथ मंडल एक शब्द भी नहीं बोल सके।
उनका गला भर आया था। अपने प्रिय नेता, संघर्ष के सहयात्री और शोषित समाज की मुक्ति के महानायक को
खोने का दुःख व्यक्त करने की शक्ति भी उनमें नहीं बची थी।
अतः उपलब्ध ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर
यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा कि जीवन के अंतिम वर्षों में बाबासाहेब और
योगेंद्रनाथ मंडल के बीच संपर्क पूरी तरह समाप्त हो गया था। इसके विपरीत, अनेक प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद
योगेंद्रनाथ मंडल निरंतर डॉ. आंबेडकर से संपर्क स्थापित करने और उनका मार्गदर्शन
प्राप्त करने का प्रयास करते रहे। उनके संबंधों का सही मूल्यांकन करने के लिए किसी
एक विवाद या अलग-थलग घटना पर नहीं, बल्कि
शोषित एवं वंचित समाज के अधिकारों की स्थापना के लिए उनके आजीवन संघर्ष और संयुक्त
ऐतिहासिक योगदान को केंद्र में रखना अधिक आवश्यक है।
(स्रोत – सदानंद विश्वास द्वारा रचित
पुस्तक ‘महाप्राण योगेंद्रनाथ, बंगभंग और अन्य प्रसंग’,
पृष्ठ 6–7)
विरोधाभास यह है कि आजकल स्वयं को
तथाकथित ‘आंबेडकरवादी’ कहने वाले एक बड़े वर्ग द्वारा महाप्राण योगेंद्रनाथ मंडल
की कथित त्रुटियों को आधार बनाकर उन्हें निरंतर छोटा सिद्ध करने और उनकी ऐतिहासिक
भूमिका को कमतर आँकने का प्रयास किया जा रहा है। वस्तुतः, डॉ. आंबेडकर और महाप्राण योगेंद्रनाथ
मंडल के दर्शन तथा उनके सामाजिक-राजनीतिक दृष्टिकोण को समझे बिना स्वयं को बहुजन
आंदोलन का विद्वान मानने वाले ऐसे लोगों के लिए यदि कोई उपयुक्त विशेषण है,
तो वह है— “विनाशकारी और भयावह आंबेडकरवादी।”
इतना ही नहीं, कुछ लोग बिना किसी गंभीर ऐतिहासिक
अध्ययन और विवेकपूर्ण विचार के बाबासाहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर को भी
‘मुस्लिम-विरोधी’ कहकर प्रचारित कर रहे हैं तथा महाप्राण योगेंद्रनाथ मंडल को भी
मानो इतिहास के कटघरे में खड़ा कर अपराधी सिद्ध करने का प्रयास कर रहे हैं।
प्रश्न यह है कि इस प्रकार की विषैली
प्रवृत्ति के दुष्परिणाम और भविष्य में उसके क्या प्रभाव हो सकते हैं? जो लोग महाप्राण योगेंद्रनाथ मंडल के
अथक संघर्ष के परिणामस्वरूप प्राप्त संवैधानिक आरक्षण और अधिकारों का लाभ उठाकर आज
उन्हीं के विरुद्ध बोल रहे हैं, क्या
उन्हें वास्तव में बंगाल सहित पूरे भारत में बहुजन आंदोलन का प्रतिनिधि कहलाने का
नैतिक अधिकार है?
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